7156863209947891,DIRECT,fec0942fa0 सांस लेने की प्रक्रिया के पीछे छिपे कौन-कौन से अनजान तथ्य हैं?

सांस लेने की प्रक्रिया के पीछे छिपे कौन-कौन से अनजान तथ्य हैं?

 

सांस लेने की प्रक्रिया के पीछे छिपे कौन कौन  से अनजान तथ्य हैं?


सांस -लेने -की -प्रक्रिया- के -पीछे -छिपे- कौन-कौन -से -अनजान -तथ्य -हैं?



आज का यह ब्लॉग पढने से पहले रुकिए, और एक गहरी साँस लीजिए। महसूस कीजिए कैसे हवा आपके भीतर प्रवेश कर रही है, फैल रही है, और फिर बाहर जा रही है। क्या यह आपको सामान्य लगता है? बिल्कुल, क्योंकि आप दिन में लगभग 20,000 बार यही क्रिया दोहराते हैं  बिना सोचे, बिना योजना बनाए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस साधारण सी लगने वाली प्रक्रिया के पीछे ऐसे अनोखे, अनजान और चौंकाने वाले तथ्य छिपे हैं, जिन्हें जानकर आप आज से अपनी साँस लेने का तरीका बदल सकते हैं? आइए आज इसी अद्भुत अनजान तथ्यों के बारे में जानते हैं।

हम साँस केवल ऑक्सीजन के लिए नहीं लेते है



सांस लेने -की- प्रक्रिया- के -पीछे -छिपे -कौन-कौन - से -अनजान- तथ्य- हैं?


जब भी हम साँस लेने की बात करते हैं, दिमाग में सबसे पहले ऑक्सीजन (O₂) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) आता है। लेकिन असली तथ्य यह है कि आपके फेफड़ों में जाने वाली हवा का केवल 21% ऑक्सीजन होता है, और आप उसका भी पूरा इस्तेमाल नहीं करते। आप जितनी ऑक्सीजन लेते हैं, उसका मात्र 5% ही शरीर उपयोग करता है  बाकी वापस बाहर निकल जाती है। हैरान हुए न?

लेकिन असली रहस्य है कार्बन डाइऑक्साइड। जी हाँ, वही CO₂ जिसे हम कचरा समझते हैं। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि साँस की प्रक्रिया को चलाने के लिए रक्त में CO₂ का एक निश्चित स्तर बेहद जरूरी है। अगर आप बहुत तेज-तेज साँस लेंगे (हाइपरवेंटिलेशन), तो आपके रक्त में CO₂ की मात्रा गिर जाएगी  जिसके परिणामस्वरूप चक्कर, झुनझुनी और यहाँ तक कि बेहोशी भी हो सकती है। यानी सही मायने में साँस लेना संतुलन का खेल है  न बहुत ज्यादा, न बहुत कम।

नाक और मुँह से साँस लेने में अंतर 


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यह तथ्य आपको शायद ही पता होगा  नाक से साँस लेना और मुँह से साँस लेना एक जैसा नहीं है। दरअसल, नाक आपके शरीर की मास्टर एयर कंडीशनर, फिल्टर और ह्यूमिडिफायर है। जब आप नाक से साँस लेते हैं, तो-

1.     वायु शुद्ध होती है- नाक के अंदर बाल (सिलिया) धूल, पराग और कीटाणुओं को रोकते हैं।

2.     तापमान नियंत्रित होता है- ठंडी हवा गर्म होकर फेफड़ों में जाती है, गर्म हवा ठंडी होती है।

3.     नमी मिलती है- सूखी हवा नम हो जाती है, जिससे फेफड़ों की नाजुक झिल्लियाँ सुरक्षित रहती हैं।

4.     नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) बनता है- नाक के साइनस में NO नामक गैस बनती है, जो रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करती है और ऑक्सीजन अवशोषण 18% तक बढ़ा देती है।

दूसरी ओर, मुँह से साँस लेना एक आपातकालीन द्वारहै। जब आप मुँह से साँस लेते हैं, तो हवा बिना फिल्टर, बिना गरम, बिना नमी के सीधे फेफड़ों में पहुँचती है इससे सूखी खांसी, गले में खराश, और यहाँ तक कि अस्थमा अटैक का खतरा बढ़ जाता है। लगातार मुँह से साँस लेने वाले बच्चों के चेहरे की हड्डियाँ भी बदल जाती हैं (लंबा चेहरा, कमजोर जबड़ा)  यह माउथ ब्रीदिंग फेशियल पैटर्नकहलाता है।

आपके शरीर का अनदेखा सुपरस्टार डायफ्राम






आपने कभी सोचा, कौन सी मांसपेशी बिना रुके आपकी पूरी जिंदगी काम करती है? हाँ, वह है डायफ्राम  एक गुंबद के आकार की मांसपेशी जो छाती और पेट के बीच स्थित होती है। जब आप साँस लेते हैं, तो डायफ्राम सिकुड़कर नीचे की ओर खिंचता है, जिससे फेफड़ों के लिए जगह बनती है। जब आप साँस छोड़ते हैं, तो डायफ्राम ऊपर उठ जाता है।

लेकिन यहाँ अनजान तथ्य यह है  अधिकांश लोग अपने डायफ्राम का केवल 30-40% उपयोग करते हैं। बाकी बेकार पड़ा रहता है, क्योंकि हम छाती से साँसलेते हैं (उथली तेज साँसें)। परिणाम? शरीर को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिलती, तनाव बढ़ता है, गर्दन और कंधों की मांसपेशियाँ (स्केलीन, सीएम) अतिरिक्त काम करने लगती हैं, जिससे दर्द होता है।

डायफ्राम को सक्रिय करने का तरीका  पेट से साँस लेना। एक हाथ पेट पर रखें, दूसरा छाती पर। साँस लें पेट बाहर आए, छाती स्थिर। साँस छोड़ें  पेट अंदर जाए। यह आपका नेचुरल राइट ब्रीदिंग है। लेकिन तनाव में हम उल्टा करते हैं  छाती से तेज साँस। योगी लोग इसी डायफ्राम को 80-90% क्षमता तक इस्तेमाल करना सीख लेते हैं।

साँस आपके दिमाग को कैसे हैक कर सकती है?






अब आते हैं सबसे रोचक तथ्य पर  साँस लेने का तरीका सीधे आपके दिमाग को बदल सकता है। स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड और अन्य संस्थानों के न्यूरोसाइंस अध्ययन बताते हैं कि साँस की लय ब्रेन वेव्सको सिंक्रोनाइज़ करती है।

·        तेज साँस (15+ चक्र/मिनट) → दिमाग में बीटा तरंगें बढ़ती हैं चिंता, घबराहट, फोकस हानि।

·        धीमी साँस (8-10 चक्र/मिनट) → अल्फा तरंगें बढ़ती हैं शांति, रचनात्मकता, ध्यान।

·        बहुत धीमी साँस (4-6 चक्र/मिनट) → थीटा तरंगें गहरी नींद, हीलिंग, अवचेतन संपर्क।

·        योगी साँस (1-2 चक्र/मिनट) → गामा तरंगें उच्च चेतना, अंतर्दृष्टि, सुपर लर्निंग।

यही कारण है कि जब आप गुस्से में होते हैं, तो आपकी साँस तेज हो जाती है  और तेज साँस गुस्सा और बढ़ा देती है। ब्रेक लगाने के लिए बस धीमी, लंबी साँसें लेनी शुरू करें  90 सेकंड में मूड बदल जाता है। इसे एकबार आजमाकर तो देखें।

दाएँ और बाएँ नासिका का बारी-बारी चलने वाला चमत्कार




क्या आपने कभी गौर किया कि कभी आपकी दाएँ नासिका अधिक खुली लगती है, तो कभी बाएँ? यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक नेज़ल साइकिल है। हर 90-120 मिनट में आपके शरीर में सूजन और रक्त प्रवाह बदलता है, जिससे एक नथुना ज्यादा सक्रिय हो जाता है और दूसरा कम।

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों मानते हैं-

·        दायाँ नथुना (पिंगला नाड़ी) शरीर को गर्म करता है, सहानुभूति तंत्र सक्रिय करता है उर्जा, पाचन, गतिविधि के लिए अच्छा।

·        बायाँ नथुना (इड़ा नाड़ी) शरीर को ठंडा करता है, परासहानुभूति तंत्र सक्रिय करता है विश्राम, नींद, ध्यान के लिए अच्छा।

अनजान तथ्य यह है कि यह चक्र आपके मूड, भूख, तापमान और यहाँ तक कि आपके अस्थमा के लक्षणों को भी प्रभावित करता है। जब आप सोने जाते हैं, तो जिस नथुने से साँस चल रही हो, उस करवट लेटने पर वह नथुना खुल जाता है और दूसरा बंद हो जाता है  इससे शरीर अपने आप रातभर संतुलन बनाता है। इसीलिए योग में अनुलोम-विलोम (बारी-बारी नासिका से साँस) का इतना महत्व है  यह इन दोनों ऊर्जा नाड़ियों को संतुलित करता है।

साँस रोकने से लेकर सीटी बजाने तक के 5 गहरे रहस्य

1. आप बिना ऑक्सीजन के कितनी देर रह सकते हैं?

औसत व्यक्ति 3-4 मिनट बिना साँस के रह सकता है (डाइविंग रिफ्लेक्स से थोड़ा अधिक)। प्रशिक्षित फ्रीडाइवर 10-12 मिनट तक रुक सकते हैं। दुनिया का रिकॉर्ड 24 मिनट 37 सेकंड (स्टिग सेवरिन्सन) का है  लेकिन उन्होंने पहले शुद्ध ऑक्सीजन ली थी। बिना तैयारी के 6 मिनट से अधिक साँस रोकना ब्रेन डैमेज शुरू कर सकता है।

2. साँस लेते समय आप 2000 से अधिक रसायन छोड़ते हैं

हाँ, आपकी साँस में न केवल O₂ और CO₂ बल्कि 2000 से अधिक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) होते हैं  जिनमें एसीटोन, आइसोप्रीन और यहाँ तक कि बेंजीन भी शामिल है। यही कारण है कि आधुनिक ब्रीथ एनालाइज़रसे डायबिटीज, किडनी रोग और कैंसर का पता लगाया जा रहा है।

3. जम्हाई  सिर्फ थकान नहीं, दिमाग की कूलिंग सिस्टम

जम्हाई (Yawning) लेने के पीछे का सबसे प्रचलित सिद्धांत अब थकाननहीं, बल्कि ब्रेन कूलिंग है। जब आपका दिमाग गर्म हो जाता है (नींद की कमी, तनाव, बोरियत), तो जम्हाई मस्तिष्क में ठंडा रक्त पहुँचाती है। यही कारण है कि आप जम्हाई लेते हैं तो अधिक हवा अंदर जाती है और कैरोटिड धमनियाँ फैलती हैं। और हाँ, जम्हाई संक्रामक होती है  यह सहानुभूति तंत्रिका तंत्र का हिस्सा है। डॉल्फिन और चूहे भी जम्हाई लेते हैं।

4. सीटी बजाना भी एक साँस तकनीक है

क्या आप जानते हैं कि सीटी बजाते समय आपकी साँस बहुत धीमी और नियंत्रित हो जाती है? यह फेफड़ों के लिए व्यायाम की तरह है। गायकों और बांसुरी वादकों के फेफड़ों की क्षमता सामान्य से 30% अधिक होती है  क्योंकि वे अपनी साँस को नोटके अनुसार नियंत्रित करते हैं।

5. आपकी साँस बताती है कि आप कौन से भोजन खाते हैं

लहसुन, प्याज, शराब, कॉफी  ये सब आपकी साँस की गंध बदलते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि केटो डाइट पर रहने वाले व्यक्ति की साँस में एसीटोन की मीठी-सी गंध आती है (फलों जैसी)। आपका शरीर जब फैट जलाता है तो कीटोन्स बनते हैं, और वे साँस के जरिए बाहर निकलते हैं। यही कारण है कि पुलिस अल्कोहल लेवल के अलावा ड्रग्स और बीमारियों का पता लगाने के लिए ब्रीथ एनालाइजर विकसित कर रही है।

साँस और भावनाओं का आपसी संबंध

हम सोचते हैं कि पहले हम डरते हैं, फिर साँस तेज होती है। लेकिन तथ्य यह है कि यह दोतरफा गली है। जब आप साँस तेज करते हैं, तो मस्तिष्क को संकेत मिलता है कि खतरा है’  भले ही कोई खतरा न हो। यही कारण है कि पैनिक अटैक के दौरान लोगों को लगता है कि वे मर रहे हैं वे बहुत तेज साँस लेने लगते हैं, जिससे रक्त में CO₂ गिरती है, दिल की धड़कन बढ़ती है, और यह एक दुष्चक्र बन जाता है।

इस चक्र को तोड़ने के लिए सबसे तेज उपाय है  बैग में साँस लेना। एक पेपर बैग लें, उसे नाक-मुँह पर रखें और धीरे-धीरे अपनी ही छोड़ी हुई CO₂ को वापस लें। कुछ ही सेकंड में CO₂ का स्तर सामान्य हो जाता है और पैनिक कम होता है। (ध्यान दें कि यह हर स्थिति में नहीं करना, केवल डॉक्टर की सलाह पर)

इसी तरह, गुस्से में धीमी साँस लेना, डिप्रेशन में गहरी साँस लेना (क्योंकि डिप्रेशन में साँस उथली हो जाती है), और एक्साइटमेंट में साँस को बराबर रखना  ये सब आपको भावनात्मक नियंत्रण देता है।

10 अनजान तथ्य जिन पर आमतौर पर बात नहीं होती

 11-साँस छोड़ना एक सक्रिय प्रक्रिया है - भले ही आप आराम से हों, छोड़ने के लिए मांसपेशियाँ काम करती हैं (लेकिन ज्यादातर लोग सोचते हैं कि यह ऑटोमैटिक है)।

2- 2- दुनिया की सबसे लंबी साँस रोकने का रिकॉर्ड महिला के पास है? - नहीं, यह पुरुषों के पास है। लेकिन महिलाओं में डाइविंग रिफ्लेक्स अधिक तीव्र होता है  उनका दिल जल्दी धीमा हो जाता है, इसलिए वे ठंडे पानी में अधिक समय तक रह सकती हैं।
3-  नवजात शिशु साँस लेना भूलजाते हैं- प्रीटर्म बेबीज में एपनिया (साँस रुकना) आम है। यही कारण है कि उन्हें मॉनिटर किया जाता है।
4-    एक साँस में 500 मिलियन अणु - हर साँस में आप लगभग 500 मिलियन ऑक्सीजन अणु अंदर ले जाते हैं, और प्रत्येक अणु माइटोकॉन्ड्रिया में ATP (ऊर्जा) बनाने के लिए इस्तेमाल होता है।
5- अगर आप साँस न लें, तो सबसे पहले दिमाग मरेगा - 4-6 मिनट बिना ऑक्सीजन के ब्रेन सेल्स मरने लगती हैं। लेकिन हृदय और फेफड़े थोड़ा और टिक जाते हैं।
6-  घोड़े केवल नाक से साँस लेते हैं - वे मुँह से साँस नहीं ले सकते (यह एक एनाटोमिकल तथ्य है)। अगर उनकी नाक बंद हो जाए, तो उनका दम घुटता है।
7- साँस लेने से ब्लड प्रेशर तुरंत बदलता है – गहरी, धीमी साँस लेने से ब्लड प्रेशर 10-15 mmHg तक गिर सकता है  यह कुछ दवाओं के बराबर है।
8-साइनस स्पेसका रहस्य – आपके चेहरे में खाली जगह (साइनस) सिर्फ आवाज गूंजाने के लिए नहीं है, बल्कि यह साँस ली गई हवा को नम करने का काम करती है और फेफड़ों को झटकों से बचाती है।
9-जीवन भर में आप कितनी हवा अंदर लेते हैं?
 – औसतन 300-400 मिलियन लीटर  यानी 1.5 ओलंपिक स्विमिंग पूल भरने लायक। इतनी हवा को 70 लाख बार साँस लेना पड़ता है।
10-  साँस छोड़ने का एक रोचक कार्य – जब आप बात करते हैं, गाते हैं या हँसते हैं, तो आप साँस छोड़ते समय ध्वनि बनाते हैं। साँस लेते समय बात नहीं कर सकते (वेंट्रिलोक्विस्ट को छोड़कर)।

प्राणायाम क्या है?

जब हम अनजान तथ्यकहते हैं, तो प्राणायाम से अधिक अनजाना कुछ नहीं है। पश्चिमी विज्ञान पिछले 20 वर्षों से यह जान रहा है कि प्राणायाम सिर्फ धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि न्यूरोफिजियोलॉजिकल प्रक्रिया है। कुछ चौंकाने वाले प्रमाण-

·      भस्त्रिका (तेज साँस लेना-छोड़ना) सहानुभूति तंत्र सक्रिय करता है, जिससे अल्पकाल में एनर्जी बढ़ती है, लेकिन लंबे समय में करने से चिंता बढ़ सकती है इसलिए सीमित मात्रा में करें।

·     कपालभाति (तेज साँस छोड़ना) डायफ्राम और पेट की मांसपेशियों को मजबूत करती है, फेफड़ों के निचले हिस्से साफ करती है। शोध बताते हैं कि 8 सप्ताह कपालभाति करने से फेफड़ों की क्षमता 25% बढ़ती है।

·      अनुलोम-विलोम (नासिका बारी) दोनों गोलार्द्धों को संतुलित करती है। एफएमआरआई स्कैन में पाया गया कि इससे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और एमीगडाला (डर केंद्र) के बीच कनेक्टिविटी सुधरती है यानी स्ट्रेस कम।

·     भ्रामरी (भौंरा साँस) धीरे-धीरे साँस छोड़ते हुए मम्की ध्वनि करना। यह वेगस तंत्रिका को सक्रिय करती है, जिससे हृदय गति घटती है और पैरासिम्पेथेटिक सिस्टम ऑन हो जाता है। ब्लड प्रेशर घटता है, अनिद्रा दूर होती है। सबसे अनजान तथ्य  आपको प्राणायाम के लिए किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है (हालाँकि सीखने में सहायक हो सकता है)। 5 मिनट रोज गहरी, धीमी साँस लेने से आपका 50% लाभ मिल जाएगा। प्राणायाम उसी का अत्याधुनिक संस्करण है।

नाक से धीमी, और पेट से गहरी सांस लेना सही तरीका है 

अब आप पूछेंगे  तो सही साँस कैसे लें? इसे याद रखें  नाक से, धीमी, लंबी, पेट से, बिना रुके

·        साँस लें – 4 सेकंड (पेट बाहर)

·        रोकें – 2-4 सेकंड (यदि आराम से हो)

·        साँस छोड़ें – 6-8 सेकंड (पेट अंदर)  छोड़ने का समय लेने से दोगुना रखें

यह विधि सबसे प्रभावी है क्योंकि लंबी साँस छोड़ने से वेगस तंत्रिका सक्रिय होती है, जो पूरे शरीर को आराम देती है। बस इतना कर लें  5 मिनट सुबह, 5 मिनट रात। 30 दिन में आप खुद को नए इंसान पाएंगे। (स्ट्रेस, बीपी, नींद, चिड़चिड़ापन  सब बेहतर)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1- क्या मुंह से साँस लेना कभी फायदेमंद हो सकता है?

उत्तर- हाँ, लेकिन केवल अत्यधिक शारीरिक परिश्रम (जैसे दौड़ना, भारी वजन उठाना) के दौरान, जब नाक पर्याप्त हवा नहीं दे पाती। या फिर जब नाक पूरी तरह बंद हो (जुकाम, एलर्जी)। रोजमर्रा में हमेशा नाक को प्राथमिकता दें।

प्रश्न 2- क्या साँस रोकने के अभ्यास से ब्रेन डैमेज हो सकता है?

उत्तर- यदि आप तब तक रोकते हैं जब तक बेहोशी न आ जाए  तो हाँ, जोखिम है। प्रशिक्षित फ्रीडाइवर रिफ्लेक्स और तकनीक से ऐसा करते हैं। सामान्य व्यक्ति केवल तब तक रोके जब तक सहज महसूस हो  जैसे ही जोर से साँस लेने की इच्छाहो, रोकना बंद कर दें।

प्रश्न 3- क्या रात में मुँह से साँस लेना खर्राटों का कारण है?

उत्तर- जी हाँ, रात में मुँह खुलकर सोने से जीभ पीछे गिरती है, गले की मांसपेशियाँ कंपन करती हैं यही खर्राटे हैं। इससे स्लीप एपनिया (साँस रुकना) भी हो सकता है। नाक से साँस लेने के लिए पोजिशनल थेरेपी (करवट लेटना) या स्ट्रिप्स काम आती हैं।

प्रश्न 4- क्या गहरी साँस हमेशा अच्छी होती है?

उत्तर- नहीं। बहुत अधिक गहरी और तेज साँस (हाइपरवेंटिलेशन) से चक्कर, मांसपेशियों में ऐंठन, और पैनिक अटैक हो सकता है। संतुलित गहरी साँस’ (धीमी, नियंत्रित) ही लाभदायक है।

प्रश्न 5- क्या साँस लेने के तरीके से वजन घट सकता है?

उत्तर- प्रत्यक्ष रूप से नहीं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से हाँ। गहरी साँस से ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, जिससे मेटाबॉलिज्म सुधरता है, तनाव कम होता है (जो वजन बढ़ाने वाले हार्मोन कोर्टिसोल को गिराता है), और आप अधिक सक्रिय होते हैं। कुछ अध्ययनों में नियमित प्राणायाम करने वालों का वजन 3-5% कम पाया गया।

प्रश्न 6- क्या बच्चों को सही साँस लेना सिखाना चाहिए?

उत्तर- बिल्कुल। बच्चे स्वभाव से पेट से साँस लेते हैं, लेकिन स्कूल, तनाव और गलत पोस्चर के कारण वे छाती से साँस लेना सीख जाते हैं। उन्हें बैलून ब्रीदिंग’ (पेट पर हाथ रखकर) सिखाएँ  इससे फोकस, नींद और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

निष्कर्ष

हर दिन, हर पल, आप बिना किसी कीमत के सबसे शक्तिशाली औजार का उपयोग कर रहे हैं  अपनी साँस। केवल साँस लेने के तरीके में थोड़ा सा परिवर्तन आपकी ऊर्जा, मूड, नींद, पाचन, इम्युनिटी और यहाँ तक कि आपकी उम्र को भी बदल सकता है। फिर भी हम इस पर ध्यान ही नहीं देते।

आज से एक छोटा सा वादा करें  दिन में 5 मिनट निकालकर बैठें और केवल अपनी साँसों को देखें। बिना उन्हें बदले, बस गवाह बनें। फिर धीरे-धीरे उन्हें धीमा, लंबा और गहरा बनाने का प्रयास करें। 30 दिनों के अंदर आप स्वयं अनुभव करेंगे कि अनजान तथ्यकितने गहरे और सच्चे थे।

और हाँ  अगली बार जब कोई आपको परेशान करे, तो गुस्सा करने से पहले तीन गहरी साँस लें। आपका समाधान निकटतम हवा में ही छिपा है।

नोट- यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। यदि आपको सांस से जुड़ी कोई गंभीर समस्या (अस्थमा, सीओपीडी, स्लीप एपनिया) है, तो कोई नई तकनीक अपनाने से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।






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