अल्कोहल शरीर में कैसे पचता है? जानिए पाचन से लेकर उत्सर्जन तक की पूरी प्रक्रिया
परिचय
क्या आपने कभी सोचा है कि
एक छोटा सा पेग शराब पीने के कुछ ही मिनटों बाद आपको हल्कापन, बातूनियापन या फिर चक्कर
क्यों आने लगता है? या
फिर कभी किसी दोस्त ने आपसे कहा होगा कि “धीरे पीओ, शरीर को पचाने का समय दो”? दरअसल, अल्कोहल को पचाना उतना
साधारण नहीं जितना हम सोचते हैं। यह कोई सामान्य भोजन या पानी नहीं है। शरीर इसके
साथ एक अनोखा व्यवहार करता है कभी इसे तुरंत अवशोषित करता
है, कभी
जहर समझकर नष्ट करने की कोशिश करता है, और कभी जिद करके बाहर
निकालने का रास्ता ढूंढता है।
इस ब्लॉग में हम विस्तार से
समझेंगे कि आखिर यह तरल पदार्थ हमारे अंदर किस रास्ते से गुजरता है, कौन से एंजाइम इसे तोड़ते
हैं, क्यों
कुछ लोग एक पैग से लाल हो जाते हैं और कुछ बोतल पीकर भी सीधे खड़े रहते हैं? तो चलिए, शुरू करते हैं इस आणविक सफर
को।
अल्कोहल पाचन क्या है
जब हम ‘पाचन’ शब्द सुनते हैं तो हमारे
दिमाग में सबसे पहले पेट, आंतें
और एंजाइम आते हैं। लेकिन अल्कोहल (जिसे रसायन विज्ञान में इथेनॉल कहते हैं) का
पाचन थोड़ा अलग है। इसे पचाने के लिए शरीर में कोई विशेष ‘अल्कोहल पाचक एंजाइम’ नहीं होता जैसे
कार्बोहाइड्रेट के लिए एमाइलेज होता है। बल्कि, अल्कोहल एक ऐसा अणु है जो
पानी और वसा दोनों में घुल सकता है। यही कारण है कि यह बिना किसी मेहनत के हमारे
रक्तप्रवाह में सीधे प्रवेश कर जाता है। इसलिए विशेषज्ञ अक्सर ‘अल्कोहल मेटाबॉलिज्म’ शब्द का उपयोग करते हैं, न कि ‘पाचन’। मेटाबॉलिज्म का मतलब है
शरीर द्वारा अल्कोहल को ऊर्जा में बदलना और अंततः उसे बाहर निकालना। यह प्रक्रिया
ज्यादातर लीवर में होती है, लेकिन
इसकी शुरुआत मुंह से ही हो जाती है।
जब शराब शरीर में बिना रुके दौड़ती है
जैसे ही आप अल्कोहल युक्त
पेय का पहला घूंट लेते हैं, यह
आपके मुंह में मौजूद श्लेष्मा झिल्ली से थोड़ी मात्रा में अवशोषित होना शुरू हो
जाता है। लेकिन असली तूफान तब आता है जब यह पेट में पहुँचता है। पेट की दीवारें
बहुत पतली और रक्त वाहिकाओं से भरी होती हैं। अल्कोहल का लगभग 20% हिस्सा सीधे पेट की दीवार
से होकर रक्त में मिल जाता है। बचा हुआ 80% छोटी आंत में जाता है, जहाँ अवशोषण की दर और भी
तेज हो जाती है, क्योंकि
छोटी आंत में सोखने का सतह क्षेत्र बहुत बड़ा (लगभग 200-300 वर्ग मीटर) होता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात:
अगर आपने खाली पेट शराब पी है, तो यह 30-60 मिनट
के भीतर अपने अधिकतम रक्त स्तर (पीक ब्लड अल्कोहल कंसंट्रेशन) तक पहुँच जाती है।
लेकिन अगर आपने पहले कुछ खाया हुआ है विशेष रूप से वसा और
प्रोटीन युक्त भोजन तो पेट का खाली होना धीमा
हो जाता है। भोजन एक तरह से ‘स्पंज’ का
काम करता है, जिससे
अल्कोहल छोटी आंत में देरी से पहुँचता है और ब्लड अल्कोहल स्तर धीरे-धीरे बढ़ता
है। यही कारण है कि नशे में डूबने से बचने के लिए ‘शराब पीने से पहले कुछ खाना’ सबसे पुराना और सबसे सही
नुस्खा माना जाता है।
रक्तप्रवाह गुर्दे,फेफड़े,लीवर से दिमाग तक
एक बार जब अल्कोहल रक्त में
प्रवेश कर जाती है, तो
यह पूरे शरीर के पानी वाले हिस्सों में फैलने लगती है। ध्यान रहे, अल्कोहल पानी में घुलनशील
है। इसलिए जिन अंगों में अधिक रक्त प्रवाह होता है जैसे मस्तिष्क, यकृत
(लीवर), गुर्दे
और फेफड़े वे पहले प्रभावित होते हैं।
दिमाग तक पहुँचने में इसे सिर्फ 5-10 मिनट लगते हैं। यहाँ पहुँचकर यह न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे GABA और ग्लूटामेट) के संतुलन को
बिगाड़ता है जिससे आपको शांति, उत्साह, बेपरवाही या कभी-कभी
आक्रामकता का अनुभव होता है।
रक्त में अल्कोहल की मात्रा
को ‘ब्लड
अल्कोहल कंसंट्रेशन’ (BAC) कहते
हैं। इसे प्रतिशत में मापा जाता है। उदाहरण के लिए, 0.08% BAC (जो कई देशों में ड्राइविंग
की कानूनी सीमा है) का मतलब है कि आपके खून के हर 1000 अणुओं में 8 अणु अल्कोहल के हैं। बीएसी 0.30% से ऊपर जाने पर कोमा और
मृत्यु का खतरा होता है। गणना करना है तो याद रखें कि एक सामान्य वयस्क का लीवर
प्रति घंटे लगभग एक मानक पेग (10-12 ग्राम शुद्ध अल्कोहल) को तोड़ पाता है। अगर आप उससे ज्यादा पी लेते हैं, तो शरीर में अल्कोहल जमा
होने लगता है।
लीवर अल्कोहल मेटाबॉलिज्म का मुख्य केंद्र
लीवर अल्कोहल मेटाबॉलिज्म
का मुख्य केंद्र है। शरीर में प्रवेश करने वाली 90% से अधिक अल्कोहल को लीवर ही
तोड़ता है। बाकी बचा हिस्सा पसीने, सांस और मूत्र के माध्यम से
बाहर निकलता है (यही वजह है कि ब्रेथलाइजर से शराब का पता चलता है)। लीवर में तीन
चरणों में यह क्रिया होती है-
चरण 1. एथेनॉल से एसीटैल्डिहाइड – सबसे पहले, ‘अल्कोहल डिहाइड्रोजनेज’
(ADH) नाम का एंजाइम अल्कोहल के अणु से
हाइड्रोजन निकालता है, जिससे वह बदल जाता है एसीटैल्डिहाइड में। एसीटैल्डिहाइड अत्यधिक विषैला
यौगिक है यही वह चीज है जो हैंगओवर के अधिकतर
लक्षणों (मतली, सिरदर्द, चेहरे का लाल होना, धड़कन तेज होना) के लिए जिम्मेदार होती है। दरअसल, शराब का नशा तो आपको भाता है,
लेकिन असली दर्द यही एसीटैल्डिहाइड
देता है। कुछ लोगों (विशेषकर एशियाई मूल के) में ADH एंजाइम बहुत तेज होता है लेकिन अगले
एंजाइम की कमी होती है इसलिए वे एक छोटी शराब पीकर लाल हो
जाते हैं और बीमार महसूस करने लगते हैं। इसे ‘अल्कोहल फ्लश रिएक्शन’
कहते हैं।
चरण 2. एसीटैल्डिहाइड से एसीटेट – दूसरे चरण में एक और एंजाइम आता है ‘एल्डिहाइड डिहाइड्रोजनेज’
(ALDH)। यह एसीटैल्डिहाइड को एसीटेट (एसिटिक
एसिड) में बदल देता है। एसीटेट बहुत कम हानिकारक होता है असल में यह सिरके का ही एक रूप है। अब
शरीर इस एसीटेट को कार्बन डाइऑक्साइड और पानी में बदलने की प्रक्रिया में लग जाता
है, और साथ ही उससे कुछ ऊर्जा भी बनाता है। प्रति ग्राम अल्कोहल से लगभग 7 कैलोरी ऊर्जा निकलती है यही कारण है कि शराब को ‘खाली कैलोरी’ कहा जाता है (क्योंकि इसमें पोषक तत्व नहीं होते, सिर्फ कैलोरी)।
चरण 3. बाहर निकलना – अंत में, एसीटेट को पूरी तरह से तोड़कर CO2
और पानी बना लिया जाता है। CO2 आपकी सांस के जरिये बाहर जाती है,
पानी पेशाब या पसीने से। लीवर इस सब
प्रक्रिया को प्रति घंटे लगभग 7-10
ग्राम शुद्ध अल्कोहल की दर से करता है।
इसे आप एक मानक पेग (लगभग 30ml 40% वोडका) के बराबर समझ सकते हैं। यह दर आपकी मर्जी से तेज नहीं की जा सकती ब्लैक कॉफी, ठंडा पानी या उल्टी करने से यह गति नहीं बढ़ती। सिर्फ समय ही आपको ‘साफ’ कर सकता है।
अल्कोहल पाचन को प्रभावित
करने वाले कारक
यह देखकर अक्सर हैरानी होती
है कि एक ही पार्टी में कोई ढेर सारी शराब पीकर भी ठीक रहता है और कोई एक बियर पीकर लड़खड़ाने
लगता है। आइए, इसके
पीछे के विज्ञान को समझें-
1. लिंग- महिलाओं में अल्कोहल को
पचाने वाला ADH एंजाइम
पेट में कम मात्रा में होता है और उनके शरीर में पानी का अनुपात पुरुषों की तुलना
में कम होता है (वसा अधिक होने के कारण)। इसलिए एक ही मात्रा पीने पर महिलाओं का BAC तेजी से बढ़ता है।
2. वजन और शरीर संरचना- कम वजन वाले व्यक्ति में
शराब कम शरीर द्रव्यमान में फैलती है, इसलिए वह जल्दी नशे में आता
है। अधिक मांसपेशीय व्यक्ति (जिसमें पानी अधिक) अल्कोहल को अधिक पतला कर सकता है।
3. आनुवंशिकी- जैसा हमने पहले बताया, एशियाई आबादी में ALDH2 एंजाइम की कमी आम है, जिससे एसीटैल्डिहाइड जमा हो
जाता है। लगभग 40% चीनी, जापानी और कोरियाई लोगों
में यह कमी पाई जाती है।
4. दवाएं और अन्य रसायन- कई दवाएं (जैसे पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स, एंटीडिप्रेसेंट) लीवर के
उन्हीं एंजाइमों का उपयोग करती हैं जो अल्कोहल को तोड़ते हैं। मिलाने पर लीवर पर
अत्यधिक दबाव पड़ता है और विषाक्तता बढ़ सकती है।
5. पेट में भोजन की मात्रा- खाली पेट पीने से अवशोषण
तेज, भरा
पेट धीमा। खासतौर पर वसायुक्त भोजन (जैसे दूध, पनीर, तला-भुना) अल्कोहल के
अवशोषण को काफी धीमा कर देता है।
6. शराब का प्रकार- कार्बोनेटेड पेय (बीयर, शैम्पेन) में मौजूद बुलबुले
पेट से छोटी आंत में अल्कोहल के जाने की गति को बढ़ा देते हैं, जिससे नशा जल्दी चढ़ता है।
वहीं, व्हिस्की
या रम जैसी डार्क स्पिरिट में कंजेनर्स (अन्य रसायन) अधिक होते हैं जो हैंगओवर
बढ़ाते हैं।
हैंगओवर क्यों होता है
अगली सुबह का सिरदर्द, मिचली और थकान यानी हैंगओवर असल में आपके शरीर में कई
कारणों से एक साथ होता है। पहला तो एसीटैल्डिहाइड का विषैला प्रभाव। दूसरा, अल्कोहल मूत्रवर्धक है
(यानी पेशाब बार-बार लाता है) इससे शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम, पोटैशियम) की कमी हो जाती
है, जिससे
सूखापन, चक्कर
और सिरदर्द होता है। तीसरा, अल्कोहल
पेट की अस्तर को जलन पहुँचाता है, जिससे मतली और उल्टी की इच्छा होती है। चौथा, नींद की गुणवत्ता खराब होती
है भले ही आप सो गए हों, लेकिन REM नींद (वह गहरी नींद जो आराम
दिलाती है) बाधित होती है। पांचवां, अल्कोहल शरीर में सूजन पैदा
करता है, जिससे
इम्यून सिस्टम सक्रिय हो जाता है और थकान, भूख न लगना जैसे लक्षण आते
हैं।
हैंगओवर से बचने का सबसे
अच्छा तरीका है सीमित मात्रा में पीना, बीच-बीच में पानी पीना, और हमेशा भोजन के साथ पीना।
कोई जादुई पिल जो हैंगओवर ठीक कर दे, मौजूद नहीं है। ‘उल्टी करना’ या ‘सुबह फिर से पी लेना’ अस्थायी
राहत तो दे सकता है, लेकिन
यह विषाक्तता को और बढ़ाता है।
क्या शरीर अल्कोहल को ‘डिटॉक्स’ कर सकता है?
आजकल डिटॉक्स टी, डिटॉक्स ड्रिंक्स और जूस
क्लींज का जमाना है। लोग सोचते हैं कि वे शराब पीने के बाद डिटॉक्स ड्रिंक पीकर
शरीर से ‘जहर’ निकाल देंगे। दुर्भाग्य से, विज्ञान इसका समर्थन नहीं
करता। आपका लीवर और किडनी ही एकमात्र ‘डिटॉक्स सिस्टम’ हैं और वे एक निश्चित गति
से काम करते हैं। नींबू पानी, ग्रीन टी या नारियल पानी पीने से आप केवल हाइड्रेशन में सुधार कर सकते हैं
और हैंगओवर के कुछ लक्षणों को कम कर सकते हैं, लेकिन अल्कोहल के
मेटाबॉलिज्म की गति नहीं बढ़ा सकते। एकमात्र ‘डिटॉक्स’ है समय देना और अगली बार कम पीना।
जब ‘पचाना’ मुश्किल हो जाता है
यदि आप नियमित रूप से (हर
रोज या सप्ताह में चार-पांच दिन) अधिक मात्रा में शराब पीते हैं, तो लीवर पर अत्यधिक काम का
बोझ पड़ता है। शुरू में लीवर में ‘फैटी लीवर’ बनता है यानी यकृत की कोशिकाओं में वसा जमा होने लगती है। यह रिवर्स हो सकता है यदि
आप शराब बंद कर दें। लेकिन अगर ऐसा ही चलता रहा तो अल्कोहलिक हेपेटाइटिस (सूजन और
कोशिका मृत्यु) हो सकती है, और
अंततः सिरोसिस जिसमें लीवर में दाग पड़
जाते हैं, वह
सख्त हो जाता है और अपना काम करना बंद कर देता है। सिरोसिस लाइलाज नहीं है, लेकिन यह काफी हद तक जीवन
भर के लिए नुकसान पहुँचा देता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कहता
है शराब के सेवन की कोई ‘सुरक्षित’ मात्रा नहीं है, हालाँकि कम मात्रा में
जोखिम कम होता है।
निष्कर्ष
तो दोस्तों, यह थी अल्कोहल की शरीर के
अंदर की एक लंबी, थकाऊ
और जटिल यात्रा। अल्कोहल शरीर में कैसे पचता है – इस सवाल का जवाब हमने
विस्तार से दिया। संक्षेप में: यह बिना पचे ही रक्त में अवशोषित हो जाती है, लीवर में ADH और ALDH एंजाइमों की मदद से
एसीटैल्डिहाइड में बदलती है (जो जहर है), फिर एसीटेट में, और अंत में CO₂ और पानी बनकर बाहर निकल
जाती है। यह प्रक्रिया समय लेती है और इसे तेज करने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए
अगली बार जब आप पीयें, तो
याद रखें आप सिर्फ एक पेय नहीं पी रहे, बल्कि अपने लीवर पर एक
शिफ्ट चढ़ा रहे हैं। सीमित मात्रा, भरपेट भोजन, भरपूर पानी और पर्याप्त
नींद ये चार स्तंभ हैं जो आपको
सुरक्षित रख सकते हैं। यदि आपको लगता है कि आप या आपका कोई प्रिय व्यक्ति अत्यधिक
शराब पी रहा है, तो
बिना देरी किसी काउंसलर या डॉक्टर से सलाह लें। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा सुख है।
अक्सर पूछे जाने वाले
प्रश्न
प्रश्न 1- क्या कॉफी पीने से नशा उतर
जाता है?