क्या आप जानते हैं? एलर्जी हानिरहित चीज के प्रति शरीर की अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया है
परिचय
सुबह-सुबह चाय बनाते
ही अचानक छींकों का तांता लग जाता है, या
फिर कभी सर्दी-जुकाम न होने के बावजूद रात में अचानक सांस लेने में दिक्कत महसूस
होती है। ऐसे में हम अक्सर मौसम बदलने या कमजोरी का हवाला देकर बात टाल देते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह सब आपके शरीर का एक अजीबोगरीब व्यवहार हो सकता है? दरअसल एलर्जी कोई बीमारी नहीं
बल्कि एक प्रकार की गलतफहमी है जो आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) अपने
आसपास की सामान्य चीजों को लेकर कर लेती है। हम जिन चीजों को नुकसानदायक नहीं
समझते, वही चीजें जब एलर्जी पीड़ित के
शरीर में प्रवेश करती हैं तो बड़ा तमाशा खड़ा हो जाता है। आइए इस ब्लॉग में हम
समझेंगे कि आखिर क्यों और कैसे आपका शरीर किसी मासूम फूल के परागकण या मूंगफली के
एक छोटे टुकड़े को ‘दुश्मन
नंबर एक’
घोषित कर देता है।
एलर्जी
क्या है?
एलर्जी शब्द सुनते ही
अक्सर लोग सोचते हैं कि यह कोई गंभीर बीमारी है, जबकि ऐसा नहीं है। एलर्जी दरअसल हानिरहित चीज के प्रति शरीर की
अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आपका शरीर किसी ऐसी चीज को
जो असल में आपका कुछ बिगाड़ने वाली नहीं है, गलती
से खतरनाक समझकर उसके खिलाफ युद्ध छेड़ देता है। मान लीजिए, आपके घर में कोई मेहमान आता है
जो बिल्कुल सामान्य और मिलनसार है, लेकिन
आपका डॉग उसे देखते ही भौंकने लगता है क्योंकि उसने पहले कभी वह व्यक्ति नहीं
देखा। बिल्कुल वैसे ही, आपकी
इम्यून सिस्टम उन चीजों को जो पहले उसने कभी 'नोटिस' नहीं
किया था,
अचानक खतरनाक समझने
लगती है और एलर्जी की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है।
सामान्य अवस्था में
हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली बैक्टीरिया और वायरस से लड़ती है, लेकिन एलर्जी के मामले में यह
पराग, धूल के कण, दवाएं, या कुछ खाद्य पदार्थों जैसे
पदार्थों पर हमला करना शुरू कर देती है। ये पदार्थ ‘एलर्जेन’ कहलाते
हैं। यह एक तरह से शरीर की ओवररिएक्शन है, जहां
शरीर अपने ही एंटीबॉडीज (जिन्हें इम्यूनोग्लोबुलिन ई या IgE कहते हैं) का अत्यधिक उत्पादन कर
देता है।
एलर्जी में जब
मासूम चीजें बन जाती हैं दुश्मन
माना कि एक छोटी सी
बच्ची रिया को मूंगफली खाना बहुत पसंद था। एक दिन उसने स्कूल में अपनी दोस्त के
साथ मूंगफली वाला सैंडविच खाया। कुछ ही मिनटों में उसके होंठ सूज गए, गले में खुजली होने लगी और सांस
लेना मुश्किल हो गया। गनीमत थी कि उसके पास एलर्जी की दवा मौजूद थी। डॉक्टर ने
बताया कि रिया को मूंगफली से ‘गंभीर
एलर्जी’ है। लेकिन सवाल यह है कि मूंगफली
जैसी हानिरहित चीज उसके लिए जहर कैसे बन गई?
यही एलर्जी का रहस्य
है। रिया का शरीर मूंगफली के प्रोटीन को एक खतरनाक आक्रमणकारी मानता है। हर बार जब
वह मूंगफली खाती है, तो
उसका इम्यून सिस्टम हिस्टामाइन नामक रसायन छोड़ता है, जिससे शरीर में सूजन, लाल चकत्ते और एनाफिलेक्सिस
(गंभीर एलर्जी प्रतिक्रिया) हो सकती है। ठीक उसी तरह, लाखों लोगों को दूध, अंडे, गेहूं, सोया, समुद्री भोजन और तिल से एलर्जी
होती है ये सभी हमारे लिए
सामान्य पोषक तत्व हैं, लेकिन
किसी के लिए यह जानलेवा साबित हो सकते हैं।
अतिसंवेदनशीलता
कब होती है शुरू?
क्या आपने कभी सोचा
है कि एलर्जी जन्म से आती है या बाद में होती है? दिलचस्प बात यह है कि पहली बार किसी एलर्जेन के संपर्क में आने पर
अक्सर कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं होती। इसके बजाय, शरीर उस एलर्जेन को ‘याद’ रखता है। जब दूसरी बार वही चीज
शरीर में प्रवेश करती है, तब
असली तूफान आता है। इसे ‘सेंसिटाइजेशन’ या सुग्राहीकरण कहते हैं।
मान लीजिए किसी को
पहली बार कोई एंटीबायोटिक दवा दी गई तब कुछ नहीं होता। लेकिन दूसरी
बार उसी दवा के एक छोटे से सेवन मात्र से ही शरीर पर लाल चकत्ते या सूजन आ सकती
है। इसीलिए डॉक्टर अक्सर पूछते हैं कि आपको पहले कभी किसी दवा से एलर्जी हुई थी
क्या? क्योंकि शरीर की यह
अतिसंवेदनशीलता बहुत तेज और अप्रत्याशित हो सकती है।
एलर्जी
के सबसे आम कारण
आइए अब जानते हैं कि
आखिर वे कौन सी ‘हानिरहित’ चीजें हैं जो एलर्जी का कारण
बनती हैं। आप उन्हें देखकर हैरान रह जाएंगे क्योंकि हम रोजाना इनसे घिरे रहते हैं।
1. पराग कण (Pollen)- बसंत ऋतु में फूल खिलते हैं, माहौल खूबसूरत हो जाता है। लेकिन पराग एलर्जी वाले लोगों के लिए यही मौसम ‘एलर्जी सीजन’ होता है। पेड़ों, घास और फूलों से निकले सूक्ष्म परागकण हवा में उड़ते हैं। ये बिल्कुल हानिरहित हैं, बस पौधों के प्रजनन का हिस्सा हैं, लेकिन कुछ लोगों की नाक और आंखें इन्हें सहन नहीं कर पातीं।
2. धूल के कण (Dust Mites)- आपके गद्दे, तकिए और कालीन में अरबों सूक्ष्म जीव रहते हैं डस्ट माइट्स। ये आपके मृत त्वचा कणों को खाते हैं। वे आपको काटते नहीं, बीमारी नहीं फैलाते, बस रहते हैं। लेकिन उनके मल और शरीर के टुकड़ों से कई लोगों को छींक, बंद नाक और अस्थमा हो जाता है।
3. फूड एलर्जी- दूध, अंडा, मूंगफली, ट्री नट्स (अखरोट, काजू), सोया, गेहूं और समुद्री भोजन – ये सात प्रमुख खाद्य पदार्थ दुनिया की 90% फूड एलर्जी के लिए जिम्मेदार हैं। गौर करें, ये सभी पौष्टिक और हानिरहित हैं, लेकिन अतिसंवेदनशील लोगों के लिए ये ट्रिगर का काम करते हैं।
4. कीड़ों का डंक- मधुमक्खी, ततैया या चींटी के डंक में मौजूद जहर असल में कीड़ों का बचाव तंत्र है। ज्यादातर लोगों को हल्का दर्द और सूजन होती है, लेकिन एलर्जी पीड़ितों में यही जहर एनाफिलेक्सिस (पूरे शरीर में गंभीर एलर्जी प्रतिक्रिया) ला सकता है।
5. दवाएं- पेनिसिलिन और अन्य एंटीबायोटिक्स, एस्पिरिन, आईबुप्रोफेन जैसी सामान्य दवाएं भी एलर्जी का बड़ा कारण हैं। ये दवाएं लाखों लोगों को ठीक करती हैं, लेकिन किसी के लिए यही चीज दाने, सूजन और सांस की तकलीफ का कारण बन जाती है।
6. लेटेक्स- गुब्बारे, सर्जिकल दस्ताने, कंडोम और कुछ चिकित्सा उपकरण रबर (लेटेक्स) से बने होते हैं। लेटेक्स प्रोटीन से कई हेल्थकेयर कर्मियों और बार-बार गुब्बारे फुलाने वाले बच्चों में त्वचा पर चकत्ते या सांस संबंधी एलर्जी हो जाती है।
एलर्जी
के लक्षण
एलर्जी के लक्षण उस
एलर्जेन के संपर्क के तरीके पर निर्भर करते हैं चाहे
वह सांस के जरिए अंदर गया, त्वचा
पर लगा, या खाने के रूप में गया।
· नाक
और आंखों से जुड़े लक्षण- छींक
आना, नाक बहना या बंद होना, आंखों में पानी, खुजली और लाली। इसे एलर्जिक
राइनाइटिस या ‘हे
फीवर’ कहते हैं।
· त्वचा
पर लक्षण- पित्ती
(Urticaria)
यानी उभरे हुए लाल
दाने, एक्जिमा (त्वचा का रूखापन और
खुजली), या एंजियोएडेमा (होंठ, पलकें, गले में सूजन)।
· पेट
से जुड़े लक्षण- मतली, उल्टी, दस्त, पेट दर्द। यह आमतौर पर फूड
एलर्जी में देखा जाता है।
· सांस
से जुड़े लक्षण- घरघराहट
(wheezing),
खांसी, सांस लेने में कठिनाई। यह
एलर्जिक अस्थमा का संकेत है।
सबसे गंभीर रूप है ‘एनाफिलेक्सिस’ – जिसमें रक्तचाप अचानक गिर जाता
है, गला सूज जाता है, सांस रुक जाती है और व्यक्ति
बेहोश हो सकता है। यह एक चिकित्सीय इमरजेंसी है और इसमें तुरंत एपिनेफ्रिन
इंजेक्शन की आवश्यकता होती है।
क्यों
कुछ लोगों को एलर्जी होती है और कुछ को नहीं?
यह सबसे बड़ा सवाल
है। आखिर एक ही माहौल में रहने वाले दो भाइयों में से एक को पराग से छींक आती है
और दूसरा मस्त रहता है, क्यों?
इसका जवाब है जेनेटिक्स और पर्यावरण का मेल। यदि आपके माता-पिता में
से किसी एक को एलर्जी है, तो
आपको भी एलर्जी होने की संभावना 30-40% तक
बढ़ जाती है। यदि दोनों को एलर्जी है तो यह संभावना 60-70% हो जाती है। लेकिन केवल जीन ही
कारण नहीं है। बचपन में संक्रमणों के संपर्क में कम आना, अत्यधिक स्वच्छता (hygiene hypothesis), प्रदूषण, और पश्चिमी जीवनशैली भी एलर्जी
को बढ़ावा देते हैं।
‘हाइजीन हाइपोथिसिस’ के अनुसार, आधुनिक युग में हम बच्चों को
बहुत साफ-सुथरे वातावरण में पालते हैं, जिससे
उनकी इम्यून सिस्टम को हानिरहित चीजों और वास्तविक खतरों में फर्क करने का मौका ही
नहीं मिलता। नतीजा वह
किसी धूल के कण पर ही ओवररिएक्ट करने लगती है।
एलर्जी
बनाम असहिष्णुता में अंतर
बहुत से लोग लैक्टोज
इंटॉलरेंस (दूध पचाने में असमर्थता) को दूध से एलर्जी समझ लेते हैं, जबकि दोनों अलग हैं। एलर्जी में
इम्यून सिस्टम सक्रिय होता है जैसे कि IgE एंटीबॉडीज बनना। असहिष्णुता में
पाचन तंत्र की समस्या होती है, इम्यून
सिस्टम कोई भूमिका नहीं निभाता।
उदाहरण के लिए, लैक्टोज इंटॉलरेंस में दूध पीने
से गैस, दस्त, पेट फूलना होता है परेशानी
तो है, लेकिन जानलेवा नहीं। जबकि दूध
प्रोटीन एलर्जी में चकत्ते, उल्टी, और एनाफिलेक्सिस भी हो सकता है।
इसलिए सही निदान के लिए डॉक्टर से मिलना बहुत जरूरी है।
कैसे
करें एलर्जी की पहचान
यदि आपको बार-बार
मौसमी एलर्जी या खाने के बाद लक्षण दिखते हैं, तो समय रहते एलर्जी टेस्ट करवाना चाहिए।
1. स्किन प्रिक टेस्ट- यह सबसे कॉमन टेस्ट है। आपकी
त्वचा पर एलर्जेन की थोड़ी मात्रा लगाकर सुई से हल्का चीरा लगाया जाता है। यदि उस
जगह पर 15-20
मिनट में लाल उभार
आता है, तो आपको उस चीज से एलर्जी है।
2. ब्लड टेस्ट (Specific IgE test)- यह टेस्ट आपके खून में खास IgE एंटीबॉडीज को मापता है। यह तब
किया जाता है जब स्किन टेस्ट संभव न हो या व्यक्ति को गंभीर त्वचा रोग हो।
3. ओरल फूड चैलेंज- इसमें डॉक्टर की निगरानी में
मरीज को थोड़ी मात्रा में संदिग्ध खाद्य पदार्थ दिया जाता है और प्रतिक्रिया देखी
जाती है। यह जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए
सिर्फ अस्पताल में किया जाता है।
एलर्जी
का इलाज
सच कहूँ तो, एलर्जी का कोई स्थायी ‘इलाज’ नहीं है जो इसे जड़ से मिटा दे।
लेकिन हाँ,
इसे कंट्रोल किया जा
सकता है और कई लोगों में यह समय के साथ अपने आप कम भी हो जाती है। बच्चों को दूध
और अंडे की एलर्जी अक्सर बढ़ते-बढ़ते ठीक हो जाती है, लेकिन मूंगफली और नट्स की एलर्जी
जीवन भर बनी रह सकती है।
चिकित्सा के तीन मुख्य स्तंभ
1. एलर्जेन से बचाव- सबसे कारगर उपाय है एलर्जी पैदा
करने वाली चीज से दूरी बनाना। पराग के मौसम में मास्क पहनना, घर में HEPA फिल्टर लगाना, खाने के लेबल ध्यान से पढ़ना।
2. दवाएं-
- एंटीहिस्टामाइन (जैसे सेटीरिज़ीन, लोराटाडाइन) – खुजली, छींक, नाक बहने से राहत।
- नेज़ल कॉर्टिकोस्टेरॉइड स्प्रे – लंबे समय तक नाक की एलर्जी के लिए।
- डिकॉन्गेस्टेंट – नाक की बंदिश खोलने के लिए (अल्पकालिक)।
- एपिनेफ्रिन ऑटो-इंजेक्टर (जैसे EpiPen) – एनाफिलेक्सिस के लिए जानलेवा स्थिति में।
3. इम्यूनोथेरेपी (एलर्जी शॉट्स या
सब्लिंगुअल टैबलेट)- इसमें
धीरे-धीरे बढ़ती मात्रा में एलर्जेन को शरीर में डाला जाता है ताकि इम्यून सिस्टम
उसे सहन करना सीख जाए। यह एक लंबी प्रक्रिया है (3-5 साल) लेकिन यह एलर्जी की गंभीरता
को काफी कम कर सकती है।
घरेलू
नुस्खे और प्राकृतिक उपाय
इंटरनेट पर भुना हुआ
जीरा, तुलसी के पत्ते, या हल्दी दूध से एलर्जी ठीक करने
के दावे भरे पड़े हैं। इनमें से कुछ चीजें राहत दे सकती हैं जैसे
नमक के पानी से नाक साफ करना (जाला नेति), भाप
लेना, या हल्दी का सेवन (सूजन कम करने
के लिए) लेकिन ये एलर्जी का इलाज नहीं
है।
मेरा सुझाव है कि
घरेलू उपायों को राहत के लिए अपनाएं, लेकिन
गंभीर लक्षणों के लिए डॉक्टर की सलाह जरूर लें। खासकर, जब बात सांस लेने की हो, तो देरी जानलेवा हो सकती है।
बच्चों
में एलर्जी
बच्चों में एलर्जी
पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि वे बता नहीं पाते। अगर आपका बच्चा बार-बार
स्किन पर रैशेज, सांस
लेते समय घरघराहट, या
खाने के बाद उल्टी करता है तो यह एलर्जी हो सकती है। हाल के शोध कहते हैं कि
शिशुओं को 4-6
महीने की उम्र में ही
मूंगफली,
दूध, अंडे जैसे एलर्जेनिक फूड देने से
बाद में एलर्जी का खतरा कम हो सकता है बेशक यह डॉक्टर की सलाह से करें।
साथ ही, बच्चों को बहुत ज्यादा सैनिटाइजर
और जीवाणुरोधी साबुन से दूर रखें; थोड़ी
गंदगी इम्यूनिटी को मजबूत बनाती है।
एलर्जी
और जीवनशैली में बदलाव
यदि आप एलर्जी के साथ
जी रहे हैं,
तो यह आपकी जिंदगी को
थोड़ा चुनौतीपूर्ण तो बनाती है, लेकिन
असंभव नहीं।
·
घर
को डस्ट माइट फ्री बनाएं- तकिए
और गद्दे पर एलर्जी प्रूफ कवर चढ़ाएं। कालीन और भारी पर्दे हटा दें। हफ्ते में एक
बार वैक्यूम क्लीनर और गीले कपड़े से पोंछा करें।
·
खाने
को लेकर सतर्क रहें- रेस्तरां
में जाते समय अपनी एलर्जी के बारे में वेटर को स्पष्ट बताएं। हमेशा अपने साथ
एंटीहिस्टामाइन या एपिपेन रखें यदि डॉक्टर ने सुझाया हो।
·
मौसम
पर नजर रखें- पराग
के दिनों में सुबह 5-10 बजे
के बीच बाहर न निकलें क्योंकि तब पराग का स्तर सबसे अधिक होता है। आने पर कपड़े
बदलें और नहा लें।
· मानसिक
स्वास्थ्य का ध्यान- लगातार
एलर्जी रहना मानसिक तनाव दे सकता है। चिंता और डिप्रेशन के लिए काउंसलिंग लें। योग
और प्राणायाम (जैसे कि कपालभाति न करें, लेकिन
अनुलोम-विलोम) सहायक हो सकते हैं।
निष्कर्ष
हमने यह तो जान ही
लिया कि एलर्जी दरअसल हानिरहित चीज के प्रति शरीर की अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया है।
यह कोई संक्रामक रोग नहीं, न
ही कमजोरी का निशान। यह आधुनिक दुनिया की एक वास्तविकता है। सबसे बड़ी बात यह है
कि एलर्जी को समझें, उसका
सम्मान करें (यानी उसे ट्रिगर करने वाली चीजों से दूर रहें) और सही जानकारी से लैस
रहें।
यदि आपको या आपके
परिवार में किसी को एलर्जी है, तो
आप अकेले नहीं हैं। दुनिया में 30-40% लोग
किसी न किसी एलर्जी से जूझ रहे हैं। डॉक्टर से संपर्क करें, जांच करवाएं और एक एक्शन प्लान
बनाएं। याद रखें, जानलेवा
एलर्जी प्रतिक्रिया (एनाफिलेक्सिस) में हर सेकंड कीमती होता है तुरंत
इमरजेंसी सेवा को कॉल करें।
अक्सर
पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न
1- क्या एलर्जी एक बार ठीक हो जाने
के बाद दोबारा हो सकती है?