7156863209947891,DIRECT,fec0942fa0 क्या आप जानते हैं? न्यूरॉन्स के अलावा ग्लियल कोशिकाएं भी मस्तिष्क की असली हीरो होती हैं?

क्या आप जानते हैं? न्यूरॉन्स के अलावा ग्लियल कोशिकाएं भी मस्तिष्क की असली हीरो होती हैं?

 

क्या आप जानते हैं? न्यूरॉन्स के अलावा ग्लियल कोशिकाएं भी मस्तिष्क की असली हीरो होती हैं?


क्या -आप -जानते- हैं? -न्यूरॉन्स- के- अलावा- ग्लियल -कोशिकाएं -भी- मस्तिष्क -की -असली- हीरो -होती- हैं?

जब भी हम दिमाग की बात करते हैं, ज्यादातर लोगों के जेहन में सबसे पहले न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाएं) का नाम आता है। हमें सिखाया गया है कि ये छोटी-सी तार जैसी कोशिकाएं हमारे सोचने, समझने, याद रखने और महसूस करने की पूरी जिम्मेदारी उठाती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि दिमाग में न्यूरॉन्स की संख्या मात्र 15 प्रतिशत के आसपास होती है? बाकी 85 प्रतिशत हिस्सा एक रहस्यमयी और उपेक्षित जनजाति का है  ग्लियल कोशिकाएं (Glial Cells)

हां, आपने सही सुना। आपके मस्तिष्क का असली बहुमत ये "ग्लिया" नामक कोशिकाएं हैं। लेकिन सालों तक विज्ञान ने इन्हें सिर्फ "गोंद" (ग्रीक भाषा में ग्लिया का अर्थ गोंद होता है) समझकर नजरअंदाज कर दिया। यह माना जाता था कि ये सिर्फ न्यूरॉन्स को चिपकाए रखने और उन्हें पोषण देने का काम करती हैं। परंतु आधुनिक शोधों ने यह साबित कर दिया है कि ग्लियल कोशिकाएं असली हीरो हैं  ये न केवल न्यूरॉन्स को कंट्रोल करती हैं, बल्कि आपकी याददाश्त, रोग प्रतिरोधक क्षमता और यहां तक कि आपके सोचने के तरीके को भी आकार देती हैं।

परिचय

शुरुआत में वैज्ञानिकों ने दिमाग को एक विशाल कंप्यूटर की तरह देखा। न्यूरॉन्स तार थे, और सिग्नल का प्रवाह ही सब कुछ था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि न्यूरॉन्स के बीच में अरबों-खरबों अन्य कोशिकाएं पड़ी हैं, तो उन्हें हैरानी हुई। उन्होंने इन्हें "ग्लिया" नाम दिया, जिसका अर्थ है "गोंद"  यानी कि बस न्यूरॉन्स को अपनी जगह पर चिपकाने का काम। यह एक बहुत बड़ी भूल थी। आज हम जानते हैं कि ग्लियल कोशिकाएं बिना किसी एक्टिविटी के बेकार नहीं बैठी हैं। वे लगातार संवाद कर रही हैं, रसायन छोड़ रही हैं, और सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे न्यूरॉन्स के जलने (firing) का फैसला भी करती हैं। जी हां, ये वो असली नायक हैं जो पर्दे के पीछे से पूरे नाटक का निर्देशन करते हैं।

चार प्रकार की ग्लियल कोशिकाएं और उनके करिश्मे


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ग्लियल कोशिकाएं एक समान नहीं होतीं। ये चार मुख्य प्रकार की होती हैं, और हर एक की अपनी विशिष्ट हीरोइक भूमिका है-

1. एस्ट्रोसाइट्स मस्तिष्क की सितारा माँ (Star-shaped Mother Cells)

ये सबसे अधिक संख्या में पाई जाती हैं। इनका आकार तारे जैसा होता है। एस्ट्रोसाइट्स असली मल्टीटास्कर हैं। यह न्यूरॉन्स को ऑक्सीजन और ग्लूकोज पहुंचाती हैं, खून से ब्रेन में जाने वाले जहरीले पदार्थों को छानती हैं (ब्लड-ब्रेन बैरियर), और चोट लगने पर दिमाग की मरम्मत करती हैं। लेकिन सबसे बड़ा कारनामा यह है कि एस्ट्रोसाइट्स सिनैप्सेस (न्यूरॉन्स के जोड़) को नियंत्रित करते हैं। यह तय करते हैं कि कौन सा सिग्नल मजबूत होगा और कौन सा कमजोर। सीखने और याददाश्त के दौरान ये सबसे ज्यादा सक्रिय होती हैं।

2. ऑलिगोडेंड्रोसाइट्स

आपने बिजली के तारों पर इंसुलेशन चढ़ा देखा होगा। ठीक वैसे ही ये कोशिकाएं न्यूरॉन्स के एक्सॉन (लंबे हाथ) पर माइलिन नामक वसायुक्त आवरण चढ़ाती हैं। इस आवरण की वजह से सिग्नल 100 गुना तेजी से यात्रा करता है। यही वजह है कि आप किसी गर्म तवे को छूते ही हाथ खींच लेते हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS) जैसी बीमारी में यही माइलिन खत्म हो जाता है, जिससे न्यूरॉन्स संवाद करना बंद कर देते हैं।

3. माइक्रोग्लिया

ये सबसे छोटी लेकिन सबसे खतरनाक सैनिक हैं। माइक्रोग्लिया दिमाग में चोरबदमाशों (बैक्टीरिया, वायरस या मृत कोशिकाओं) को ढूंढती हैं और उन्हें खा जाती हैं (फैगोसाइटोसिस)। जब दिमाग में सूजन होती है, तो ये एक्टिव हो जाती हैं। लेकिन ध्यान रहे, जरूरत से ज्यादा सक्रिय माइक्रोग्लिया अल्जाइमर और पार्किंसन्स जैसी बीमारियों की जड़ होती हैं।

4. एपेंडिमल सेल्स

ये कोशिकाएं दिमाग के अंदरूनी हिस्सों (वेंट्रिकल्स) में लाइन लगाती हैं और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) – यानी मस्तिष्क की सुरक्षात्मक पानीदार परत  का निर्माण और संचलन करती हैं।


ग्लियल कोशिकाएं ही असली हीरो कैसे हैं?


क्या -आप -जानते- हैं? -न्यूरॉन्स -के -अलावा- ग्लियल -कोशिकाएं- भी- मस्तिष्क -की -असली -हीरो-होती- हैं?


अब सवाल यह है कि इन्हें "असली हीरो" क्यों कहा जाए? यहां तीन बेहतरीन कारण हैं-

पहला रहस्य- न्यूरॉन्स बिना ग्लिया के कुछ भी नहीं कर सकते।

एक प्रयोग में जब वैज्ञानिकों ने न्यूरॉन्स को अकेले पेट्री डिश में उगाया, तो वे कुछ ही सेकंड में सिग्नल भेजना शुरू कर देते थे, लेकिन फिर तुरंत मर जाते थे। जब उन्होंने उनके साथ एस्ट्रोसाइट्स डाली, तो न्यूरॉन्स ने स्वस्थ और लंबे समय तक जीवित रहते हुए जटिल नेटवर्क बनाए। यानी न्यूरॉन्स को जीने के लिए ग्लिया की देखभाल अनिवार्य है

दूसरा रहस्य- याददाश्त का निर्माण ग्लिया करती है।
पहले सोचा जाता था कि यादें सिर्फ न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन से बनती हैं। 2017 के एक नेचर जर्नल के अध्ययन ने साबित किया कि एस्ट्रोसाइट्स सीखने के दौरान विशेष रसायन (D-serine) छोड़ते हैं जो सिनैप्स को लंबे समय तक सक्रिय रखता है। अगर आप किसी चीज को लंबे समय तक याद रख पाते हैं, तो इसका श्रेय आपके एस्ट्रोसाइट्स को जाता है, न कि सिर्फ न्यूरॉन्स को।

तीसरा रहस्य- नींद के दौरान ग्लिया आपका दिमाग साफ करती है।
जब आप सोते हैं, तो ग्लियल कोशिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे दिमाग की कोशिकाओं के बीच जगह बन जाती है। तब मस्तिष्कमेरु द्रव (CSF) तेजी से बहता है और दिनभर जमा हुए टॉक्सिन्स  जैसे बीटा-एमिलॉयड (अल्जाइमर का प्रोटीन)  को बाहर निकाल देता है। यह सफाई का काम पूरी तरह से ग्लियल (मुख्यतः एस्ट्रोसाइट्स) द्वारा किया जाता है। यानी अच्छी नींद आपकी ग्लिया को मजबूत बनाती है।

न्यूरॉन्स का नहीं, ग्लिया का एक्साइटेमेंट


क्या -आप -जानते- हैं? -न्यूरॉन्स- के -अलावा- ग्लियल- कोशिकाएं -भी- मस्तिष्क -की -असली- हीरो -होती -हैं?


कई सालों तक न्यूरोसाइंस में यह मान्यता थी कि सिर्फ न्यूरॉन्स ही विद्युत रासायनिक संकेत पैदा करते हैं। ग्लिया "मूक" मानी जाती थी। लेकिन हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने पाया कि एस्ट्रोसाइट्स भी कैल्शियम वेव्स के रूप में अपने स्वयं के सिग्नल पैदा करते हैं। हालांकि यह न्यूरॉन्स जितना तेज नहीं है, लेकिन यह लंबे समय तक चलने वाला और व्यापक होता है।

सबसे हैरान करने वाला खुलासा यह था कि जब एस्ट्रोसाइट्स सक्रिय होते हैं, तो वे ट्रिपल-पार्टाइट सिनैप्स का निर्माण करते हैं। यानी एक सिनैप्स में अब केवल दो न्यूरॉन्स नहीं बल्कि एक "प्री-सिनैप्टिक न्यूरॉन", एक "पोस्ट-सिनैप्टिक न्यूरॉन" और एक "एस्ट्रोसाइट" शामिल है। एस्ट्रोसाइट न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे ग्लूटामेट) को चूस लेता है और जरूरत के हिसाब से वापस छोड़ता है। यह पूरी प्रक्रिया बताती है कि मस्तिष्क सिर्फ एक कंप्यूटर नहीं, बल्कि एक जीवंत, बातूनी पारिस्थितिकी तंत्र है।

बीमारियों का काला अध्याय

अगर ग्लियल कोशिकाएं हीरो हैं, तो जब ये खराब हो जाएं, तो सबसे बड़ी विलेन बन जाती हैं। यही कारण है कि आधुनिक दवाएं अब न्यूरॉन्स के बजाय ग्लिया को टारगेट कर रही हैं।

·     अल्जाइमर रोग - इसमें माइक्रोग्लिया बहुत अधिक सक्रिय हो जाती हैं और जरूरत से ज्यादा सूजन पैदा करती हैं, जिससे स्वस्थ न्यूरॉन्स मर जाते हैं। साथ ही एस्ट्रोसाइट्स बीटा-एमिलॉयड प्लाक को साफ नहीं कर पाते।

·     पार्किंसंस रोग - एस्ट्रोसाइट्स में डोपामाइन न्यूरॉन्स की रक्षा करने की क्षमता खत्म हो जाती है।

·     डिप्रेशन और सिज़ोफ्रेनिया - अध्ययन बताते हैं कि उदास मस्तिष्क में एस्ट्रोसाइट्स की संख्या घट जाती है, और माइक्रोग्लिया अत्यधिक भड़काऊ अवस्था में पहुंच जाती है।

·        ग्लियोब्लास्टोमा - यह सबसे खतरनाक ब्रेन कैंसर है, और यह एस्ट्रोसाइट्स के अनियंत्रित विभाजन से ही बनता है।

इसलिए, न्यूरोलॉजिस्ट आज कहते हैं"न्यूरॉन्स के रोगों के बजाय, ग्लिया के रोगों" का अध्ययन करो।

अपनी ग्लियल कोशिकाओं को हीरो कैसे बनाएं?

आपके व्यवहार का सीधा असर आपकी ग्लिया पर पड़ता है। इनसेल्फ को मजबूत बनाकर आप अपने दिमाग की असली सेना तैयार कर सकते हैं।

1.     गहरी नींद लें (7-8 घंटे)- जैसा कि हमने बताया, नींद में ग्लिया टॉक्सिन्स साफ करती है। रात 2 बजे तक जागना आपके एस्ट्रोसाइट्स के लिए जहर के समान है।

2.     ओमेगा -3 फैटी एसिड्स खाएं- अखरोट, अलसी, और वसायुक्त मछली (साल्मन) माइलिन शीथ (ऑलिगोडेंड्रोसाइट्स) की मरम्मत करते हैं।

3.     इंटरमिटेंट फास्टिंग या कम कार्ब डाइट- जब आप कम खाते हैं, तो माइक्रोग्लिया को "रीसेट" होने का मौका मिलता है। केटोजेनिक डाइट तो एस्ट्रोसाइट्स को असाधारण रूप से मजबूत बनाती है।

4.     एक्सरसाइज करें- व्यायाम से माइक्रोग्लिया का शांत और सुरक्षात्मक रूप बढ़ता है। यह सूजन कम करता है और नए माइलिन निर्माण को ट्रिगर करता है।

5.     तनाव प्रबंधन- क्रॉनिक स्ट्रेस माइक्रोग्लिया को "क्रोधित" बना देता है। योग और ध्यान इन्हें शांत रखने में मदद करते हैं।

निष्कर्ष

इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है कि सरदार को तो तालियां मिलीं, लेकिन पीछे काम करने वाले सैनिकों को भुला दिया गया। न्यूरॉन्स वो सरदार हैं जो तलवार लहराते हैं, लेकिन ग्लिया वो जमीन हैं, वो हथियार हैं, वो रसद हैं और वो सेना हैं। बिना ग्लिया के, न्यूरॉन्स बेकार, अल्पकालिक और असंगठित हैं।

आज के इस ब्लॉग का उद्देश्य यह बताना था कि अगली बार जब आप "ब्रेन पावर" बढ़ाने की बात करें, तो केवल न्यूरॉन्स की कसरत न सोचें। अपनी ग्लियल कोशिकाओं को पोषित करें। उन्हें सुलाएं, उन्हें खिलाएं और उन्हें व्यस्त रखें। यही असली बुद्धिमत्ता का रहस्य है। क्योंकि अब समय आ गया है कि हम ग्लिया को उनका उचित सम्मान दें  मस्तिष्क के असली, अपरिहार्य और अदृश्य हीरो के रूप में।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. क्या न्यूरॉन्स से ज्यादा ग्लियल कोशिकाएं होती हैं?
हां, लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि अनुपात 10:1 है (10 ग्लिया : 1 न्यूरॉन)। लेकिन हाल के शोध कहते हैं कि यह अनुपात लगभग 1:1 है। फिर भी मात्रा में ग्लिया न्यूरॉन्स से कम नहीं हैं, और कुछ क्षेत्रों में तो अधिक ही हैं।

2. क्या ग्लियल कोशिकाएं भी सोचती हैं?
वे "सोचती" उस तरह नहीं जैसे न्यूरॉन्स सोचते हैं, लेकिन वे सूचना प्रोसेसिंग में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। वे सिनैप्टिक प्लास्टिसिटी (याददाश्त का आधार) को नियंत्रित करके अप्रत्यक्ष रूप से सोचने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

3. क्या ग्लिया कोशिकाएं कैंसर का कारण बन सकती हैं?
जी हां, सबसे आक्रामक ब्रेन ट्यूमरग्लियोब्लास्टोमा, ग्लियल कोशिकाओं (विशेषकर एस्ट्रोसाइट्स) के अनियंत्रित विभाजन से बनता है।

4. क्या बिना ग्लिया के न्यूरॉन्स काम कर सकते हैं?
बिल्कुल नहीं। प्रयोगशाला में न्यूरॉन्स को ग्लिया के बिना उगाने पर वे कुछ ही दिनों में मर जाते हैं। ग्लिया उनके लिए पोषण, ऑक्सीजन और सुरक्षा प्रदान करती है।

5. अगर ग्लिया इतनी शक्तिशाली हैं, तो आखिर में फोकस न्यूरॉन्स पर ही क्यों है?
क्योंकि न्यूरॉन्स विद्युत सिग्नल (स्पाइक्स) पैदा करते हैं, जिन्हें 20वीं सदी के टूल्स से मापना आसान था। ग्लिया की धीमी कैल्शियम वेव्स को समझने के लिए आधुनिक इमेजिंग का विकास इंतजार कर रहा था। विज्ञान में हमेशा पहले तेज और ऊर्जावान चीजों पर ध्यान जाता है।

6. क्या ग्लिया कोशिकाओं को ठीक करके मानसिक बीमारी का इलाज संभव है?
हां, यही न्यूरोसाइंस का सबसे रोमांचक मोर्चा है। शोधकर्ता ऐसी दवाएं विकसित कर रहे हैं जो माइक्रोग्लिया की सूजन को शांत करें या एस्ट्रोसाइट्स को न्यूरॉन्स की रक्षा के लिए प्रेरित करें। यह अल्जाइमर और डिप्रेशन के इलाज में क्रांति ला सकता है।

 


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