क्या नींद की कमी हमें बीमार बना सकती है?
परिचय
आज
की तेज़-रफ्तार ज़िंदगी में नींद को अक्सर हम अपनी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे रख
देते हैं। काम का बोझ, ऑनलाइन
जीवन, परिवार की जिम्मेदारियाँ और सोशल
मीडिया इन सबके बीच हम अपने शरीर को
पर्याप्त आराम देना भूल जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नींद की यह कमी आपको
धीरे-धीरे बीमार बना सकती है? नींद
मानव स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती का एक अनिवार्य पहलू है, फिर भी हमारी आधुनिक दुनिया में
बहुत से लोग इस महत्वपूर्ण घटक पर कंजूसी करते हैं।
विश्व
स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अपर्याप्त
नींद और सर्कैडियन रिदम में गड़बड़ी मोटापा, हृदय
रोग और संज्ञानात्मक हानि जैसी नकारात्मक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी है। यह लेख आपको
विस्तार से बताएगा कि कैसे नींद की कमी आपके शरीर की हर प्रणाली को प्रभावित करती
है और आप इससे कैसे बच सकते हैं।
नींद
की कमी के तात्कालिक प्रभाव
नींद
की कमी का प्रभाव अगले ही दिन दिखाई देने लगता है। व्यक्ति को थकान, उनींदापन, चिड़चिड़ापन और ध्यान केंद्रित करने में
कठिनाई महसूस हो सकती है। निर्णय लेने की क्षमता, प्रतिक्रिया समय और स्मरण शक्ति भी
अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है। इसके कारण पढ़ाई, कार्यक्षमता और वाहन चलाने जैसी
गतिविधियों में गलतियों तथा दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ जाता है। साथ ही, शरीर की ऊर्जा कम होने से दैनिक कार्य
करना भी कठिन लग सकता है।
नींद
की कमी का असर शरीर और दिमाग पर लगभग तुरंत दिखने लगता है। आइए जानते हैं ये
तात्कालिक प्रभाव क्या हैं-
1.संज्ञानात्मक
क्षमता में गिरावट
नींद
की कमी के सबसे स्पष्ट अल्पकालिक प्रभावों में से एक है संज्ञानात्मक हानि। यह
ध्यान, सतर्कता, एकाग्रता, तर्क क्षमता और समस्या-समाधान को
प्रभावित करती है। इसके परिणामस्वरूप-
·
तथ्यों
को याद रखने में कठिनाई होती है
·
प्रतिक्रिया
समय में कमी आ आती है
·
निर्णय
लेने की क्षमता में कमी आ जाती है
2.भावनात्मक
असंतुलन
नींद
की कमी भावनात्मक नियंत्रण को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। व्यक्ति
चिड़चिड़ापन,
मूड में उतार-चढ़ाव
और तनाव के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि का अनुभव कर सकता है। यह भावनात्मक
अस्थिरता रिश्तों को प्रभावित करती है और जीवन की समग्र गुणवत्ता को कम कर देती
है।
3.शारीरिक
लक्षण
शारीरिक
रूप से, नींद से वंचित व्यक्ति अक्सर
सिरदर्द,
चक्कर आना, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएँ, मांसपेशियों में थकान और
अस्वस्थता की सामान्य भावना प्रदर्शित करते हैं।
क्या नींद की कमी से हम बीमार पड़ सकते हैं?
हाँ,
पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि
लगातार नींद की कमी शरीर को कई प्रकार की बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना
सकती है। जब हम पर्याप्त नींद नहीं लेते, तो प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) कमजोर होने लगता है और
संक्रमणों से लड़ने की क्षमता घट जाती है। शोध बताते हैं कि कम नींद लेने वाले
लोगों को सर्दी-जुकाम, फ्लू
और अन्य वायरल संक्रमण होने का जोखिम अधिक होता है। इसके अलावा, नींद की कमी शरीर में सूजन
(इन्फ्लेमेशन) बढ़ा सकती है, जिससे
हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी दीर्घकालिक
बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। मस्तिष्क भी प्रभावित होता है, जिससे याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता
कमजोर हो सकती है। लगातार नींद की कमी मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव
डालती है और चिंता तथा अवसाद जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ाती है। इसलिए स्वस्थ शरीर,
मजबूत प्रतिरक्षा और बेहतर मानसिक
संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिदिन 7–9 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लेना अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
1. हृदय
रोग
लंबे
समय में,
दिन में 6 घंटे से कम सोने से हृदय रोग
होने की संभावना 2 गुना बढ़ सकती है। ऐसा इसलिए होता है
क्योंकि नींद की कमी से हृदय गति बदल जाती है और रक्तचाप बढ़ जाता है क्योंकि शरीर
आराम नहीं कर पाता।
आज
की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में नींद की कमी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही
है। पर्याप्त नींद न लेने से हार्ट अटैक, हाई ब्लड
प्रेशर और स्ट्रोक जैसी
हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों
के अनुसार,
खराब नींद उच्च
रक्तचाप,
हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, मोटापा, अवसाद और संज्ञानात्मक गिरावट से
निकटता से जुड़ी हुई है।
2. मधुमेह
(डायबिटीज)
क्या
आप जानते हैं कि जब आप कम सोते हैं, तो
आपके शरीर की रक्तप्रवाह में ग्लूकोज को प्रोसेस करने की क्षमता बाधित हो जाती है? । इस प्रकार, आप टाइप 2 मधुमेह के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते
हैं।
नींद
की कमी शरीर की चयापचय प्रक्रिया को बाधित करती है, जिससे मोटापा, मधुमेह और
मेटाबोलिक सिंड्रोम का
खतरा बढ़ जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध से पता चलता है कि नींद बढ़ाने से
इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने में मदद मिल सकती है।
3. मोटापा
जब
आपकी नींद पूरी नहीं होती तो आप मोटापे को
निमंत्रण देते हैं। ऐसा हार्मोनल असंतुलन के कारण होता है-
- ग्रेलिन (भूख बढ़ाने वाला हार्मोन) बढ़ जाता है
- लेप्टिन (भूख नियंत्रित करने वाला रसायन) कम हो जाता है
शोध
बताते हैं कि गंभीर नींद की कमी से भूख में बदलाव और अत्यधिक भोजन की प्रवृत्ति
पैदा होती है,
जो समय के साथ वजन
बढ़ाने में योगदान करती है।
4. कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली
“जब
आप सो रहे होते हैं तो आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली सबसे अधिक सक्रिय होती है”। नींद की कमी से प्रतिरक्षा
प्रणाली कमजोर हो
जाती है,
जिससे व्यक्ति
संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
एक
अध्ययन में पाया गया कि सिर्फ
एक रात की
24-घंटे की नींद की कमी युवा, स्वस्थ व्यक्तियों में
प्रतिरक्षा कोशिकाओं के प्रोफाइल को बदल सकती है। यदि ये परिवर्तन बने रहते हैं, तो ये दीर्घकालिक सूजन की स्थिति
और बीमारी के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
शोध
से पता चलता है कि नींद संबंधी विकार वाले व्यक्तियों में सिस्टमिक ल्यूपस
एरिथेमेटोसस, रुमेटॉइड
आर्थराइटिस, एंकिलोज़िंग
स्पोंडिलाइटिस और स्जोग्रेन सिंड्रोम जैसी प्रतिरक्षा-मध्यस्थ
बीमारियों का जोखिम 1.45 से
1.81 गुना अधिक होता है।
5. मानसिक
स्वास्थ्य
नींद
की कमी मानसिक स्वास्थ्य विकारों, विशेष
रूप से चिंता और
अवसाद से
गहराई से जुड़ी हुई है।
स्लीप डिप्रिवेशन सर्कैडियन
डिसरेग्युलेशन और हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-एड्रिनल एक्सिस के हाइपरएक्टिवेशन के
कारण तनाव प्रतिक्रिया शुरू करके अवसाद का कारण बनता है।
भारतीय
आबादी पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि बेडटाइम प्रोक्रास्टिनेशन (सोने का समय टालना) चिंता, अवसाद, नींद की गुणवत्ता और व्यक्तिपरक
कल्याण को खराब करता है।
रोग नियंत्रण केंद्र नींद
की कमी को एक सार्वजनिक
स्वास्थ्य महामारी के
रूप में वर्गीकृत करता है।
6. अल्जाइमर
और न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग
नींद
की कमी अल्जाइमर रोग और पार्किंसंस
रोग जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के
जोखिम को बढ़ा सकती है। नींद की कमी से पार्किंसंस रोग और अल्जाइमर रोग के मुख्य
लक्षण, जैसे अनियमित प्रोटीन संचय और
तंत्रिका संचार में कमी, बढ़
जाते हैं।
विश्व
स्वास्थ्य संगठन का सुझाव है कि नींद की कमी और सर्कैडियन रिदम में गड़बड़ी अल्जाइमर रोग विकसित होने के जोखिम से जुड़ी
हो सकती है।
7. आंत
के स्वास्थ्य पर प्रभाव
नवीनतम
शोध बताते हैं कि नींद की कमी आंत माइक्रोबायोटा को बाधित करती है, जिससे डिस्बायोसिस होता है। यह डिस्बायोसिस अवसाद, चिंता और
संज्ञानात्मक गिरावट जैसे
न्यूरोलॉजिकल विकारों को बढ़ाता है।
भारत
में नींद की कमी का संकट
भारत में नींद की कमी एक तेजी से बढ़ती
सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। आधुनिक जीवनशैली, लंबे कार्य घंटे, देर रात तक मोबाइल और सोशल मीडिया का
उपयोग, तनाव तथा अनियमित
दिनचर्या के कारण बड़ी संख्या में लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। युवाओं,
कामकाजी पेशेवरों और विद्यार्थियों में
यह समस्या विशेष रूप से अधिक देखी जा रही है। लगातार कम नींद लेने से एकाग्रता,
स्मरण शक्ति और कार्यक्षमता प्रभावित
होती है, साथ ही मोटापा,
मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी
समस्याओं का जोखिम भी बढ़ जाता है। सड़क दुर्घटनाओं और कार्यस्थल पर होने वाली
त्रुटियों में भी नींद की कमी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। इस संकट से निपटने
के लिए नियमित सोने-जागने का समय, सोने
से पहले स्क्रीन का सीमित उपयोग, तनाव
प्रबंधन, नियमित व्यायाम और
पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण नींद को दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाना आवश्यक है।
जागरूकता और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस बढ़ती समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया
जा सकता है।
भारत में नींद की कमी एक गंभीर
सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनती
जा रही है-
- 59% भारतीय रात में 6 घंटे से कम नींद लेते हैं
- 60% भारतीय वयस्क 6 घंटे से कम निर्बाध नींद लेते हैं
- 25.7% भारतीय अनिद्रा (इंसोम्निया) से पीड़ित हैं
- 37.4% भारतीय ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) से प्रभावित हैं
- 10 में से 1 कर्मचारी नींद संबंधी विकारों से ग्रसित है
- 33% से अधिक वयस्क अनिद्रा या खराब नींद की गुणवत्ता के लक्षण बताते हैं
नींद
की कमी सीधे तौर पर मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप
और हृदय समस्याओं जैसी
लाइफस्टाइल बीमारियों के बढ़ने का कारण बन रही है। लगभग आधे कामकाजी
भारतीयों ने
नींद की कमी के कारण बीमारी की छुट्टी ली है।
37% भारतीय
कर्मचारी रात
9 बजे के बाद नाइट शिफ्ट में काम
करते हैं,
और 88% भारतीय सोने से पहले फोन का उपयोग करते
हैं जिससे
ब्लू लाइट मेलाटोनिन उत्पादन को कम करती है।
बच्चों
में नींद की कमी
बच्चों
के शारीरिक, मानसिक
और भावनात्मक विकास के लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद अत्यंत आवश्यक है। यदि
बच्चों को उनकी आयु के अनुसार पर्याप्त नींद नहीं मिलती, तो इसका प्रभाव उनके मस्तिष्क के विकास,
सीखने की क्षमता, स्मरण शक्ति और एकाग्रता पर पड़ सकता
है। नींद की कमी के कारण बच्चे चिड़चिड़े हो सकते हैं, उनका व्यवहार आक्रामक हो सकता है तथा
पढ़ाई में प्रदर्शन भी प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक नींद की कमी रहने पर
मोटापा, कमजोर प्रतिरक्षा
तंत्र, बार-बार बीमार पड़ना
और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। देर रात तक मोबाइल,
टीवी या वीडियो गेम का उपयोग, अनियमित दिनचर्या और तनाव इस समस्या के
प्रमुख कारण हैं। माता-पिता को बच्चों के लिए नियमित सोने-जागने का समय निर्धारित
करना चाहिए, सोने
से पहले स्क्रीन का उपयोग कम कराना चाहिए और शांत तथा आरामदायक वातावरण उपलब्ध
कराना चाहिए। पर्याप्त नींद बच्चों के स्वस्थ विकास और बेहतर भविष्य की मजबूत नींव
है।
बच्चों
में नींद की कमी उनके संपूर्ण जीवन को
प्रभावित करने वाली बीमारियों का कारण बन सकती है। नींद बच्चे के मस्तिष्क और
भावनाओं को गहराई से प्रभावित करती है।
अपर्याप्त नींद वाले बच्चों में-
·
भावनाओं
को नियंत्रित करने में कठिनाई
- ध्यान अवधि और फोकस में कमी
- अधिक प्रतिक्रियाशील और कम अनुकूलनशील व्यवहार
बच्चों
में नींद संबंधी समस्याओं के मुख्य कारणों में डिजिटल
डिवाइसों का अत्यधिक उपयोग, अनियमित
सोने-जागने का समय, अत्यधिक
कैफीन या मीठा खाना, पढ़ाई का
मानसिक दबाव, और डर या
बुरे सपने शामिल
हैं।
नींद
की कमी के पीछे का विज्ञान
नींद की कमी केवल
थकान का कारण नहीं होती,
बल्कि इसके पीछे जटिल जैविक और तंत्रिका संबंधी प्रक्रियाएँ
कार्य करती हैं। हमारे शरीर की सर्कैडियन लय और होमियोस्टैटिक स्लीप
ड्राइव मिलकर यह नियंत्रित
करती हैं कि हमें कब नींद आएगी और कितनी देर तक सोना आवश्यक है। जब हम लगातार देर
तक जागते रहते हैं, तो
मस्तिष्क में एडेनोसिन नामक
रसायन जमा होने लगता है,
जिससे नींद का दबाव बढ़ता है। यदि इस प्राकृतिक संकेत को
बार-बार अनदेखा किया जाए,
तो शरीर की जैविक घड़ी असंतुलित हो जाती है। साथ ही, देर
रात कृत्रिम रोशनी और मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन
के स्राव को कम कर देती है,
जिससे नींद आने में कठिनाई होती है। लंबे समय तक नींद की कमी
रहने पर तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जिससे
प्रतिरक्षा तंत्र, स्मरण
शक्ति, चयापचय
(मेटाबॉलिज़्म) और हृदय स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि
वैज्ञानिक पर्याप्त और नियमित नींद को अच्छे स्वास्थ्य का एक मूल आधार मानते हैं।
ऑक्सीडेटिव
तनाव और सूजन
नींद
की कमी ऑक्सीडेटिव तनाव और सूजन को प्रेरित कर सकती है, जिससे समय से पहले मृत्यु का
जोखिम बढ़ जाता है। लंबे समय तक नींद की कमी अंततः सामान्य सेलुलर प्रक्रियाओं के
असंतुलन और रिएक्टिव
ऑक्सीजन स्पीशीज़ के
अत्यधिक उत्पादन की ओर ले जाती है।
न्यूरोइन्फ्लेमेशन
और आंत-मस्तिष्क अक्ष
नींद
की कमी न्यूरोइन्फ्लेमेशन को प्रेरित करती है, आंतों के बैरियर और गट
माइक्रोबायोटा को बाधित करती है, हिप्पोकैम्पस
की संरचना और कार्य को क्षतिग्रस्त करती है, और सिनैप्टिक
प्लास्टिसिटी को
बदल देती है।
एक
हालिया अध्ययन में पाया गया कि नींद की कमी डोपामाइन-संचालित माइटोकॉन्ड्रियल रिवर्स इलेक्ट्रॉन
ट्रांसपोर्ट को
सक्रिय करती है, जो
गट-रेजिडेंट मैक्रोफेज में ROS (रिएक्टिव
ऑक्सीजन स्पीशीज़) के निर्माण को शुरू करती है।
नींद
की कमी से बचाव और सुधार के उपाय
नींद की कमी से बचने
के लिए प्रतिदिन एक ही समय पर सोने और जागने की आदत बनाएं। सोने से कम से कम एक
घंटा पहले मोबाइल, टीवी
और लैपटॉप जैसी स्क्रीन का उपयोग कम करें। शाम के समय कैफीन और निकोटीन से बचें
तथा नियमित व्यायाम करें,
लेकिन सोने से ठीक पहले भारी व्यायाम न करें। शयनकक्ष को शांत, अंधेरा
और आरामदायक रखें। यदि कई सप्ताह तक अच्छी नींद न आए या दिनभर अत्यधिक थकान महसूस
हो, तो
उचित कारण जानने और उपचार के लिए डॉक्टर या नींद विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।
1. नियमित
नींद का समय निर्धारित करें
हर
दिन एक ही समय पर सोने और जागने की आदत डालें। यह आपके सर्कैडियन
रिदम को
संतुलित रखता है।
2. सोने
से पहले डिजिटल डिवाइस से दूरी बनाएँ
सोने
से कम से कम 1
घंटे पहले फोन, लैपटॉप और टीवी का उपयोग बंद कर
दें। ब्लू लाइट मेलाटोनिन उत्पादन को कम करती है।
3. आरामदायक
नींद का वातावरण बनाएँ
·
ब्लैकआउट
पर्दे – प्रकाश
प्रदूषण को रोकने के लिए
·
व्हाइट
नॉइज़ मशीन – शोर
को अवरुद्ध करने के लिए
·
एयर
प्यूरीफायर – प्रदूषण
से बचाव के लिए
4. कैफीन
और भारी भोजन से बचें
सोने से 4-6 घंटे पहले कैफीन और भारी भोजन से
बचें।
5. नियमित
व्यायाम करें
शारीरिक
गतिविधि नींद की गुणवत्ता में सुधार करती है। शोध बताता है कि व्यायाम नींद की कमी
से प्रेरित चिंता और अवसाद को रोक सकता
है।
6. संज्ञानात्मक
व्यवहार थेरेपी (CBT)
अनिद्रा
के लिए CBT
एक प्रभावी उपचार है।
यह नींद से जुड़ी नकारात्मक सोच और व्यवहार को बदलने में मदद करता है।
7. नैप
(झपकी) लें
दिन
में 15-20
मिनट की छोटी झपकी
लेना फायदेमंद हो सकता है।
निष्कर्ष
नींद
केवल आराम करने का समय नहीं है, बल्कि
यह शरीर और मस्तिष्क की मरम्मत, ऊर्जा
पुनर्संचय और संपूर्ण स्वास्थ्य बनाए रखने की एक आवश्यक जैविक प्रक्रिया है।
पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करती है, स्मरण शक्ति और एकाग्रता को बेहतर बनाती
है तथा हृदय, हार्मोन
और चयापचय को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके विपरीत, लगातार नींद की कमी मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक तनाव, अवसाद और हृदय रोग जैसी अनेक स्वास्थ्य
समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती है। इसलिए व्यस्त जीवनशैली में भी नींद को प्राथमिकता
देना आवश्यक है। नियमित दिनचर्या अपनाना, सोने से पहले स्क्रीन का सीमित उपयोग करना, संतुलित आहार लेना और तनाव को नियंत्रित
करना अच्छी नींद के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। याद रखें, स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव केवल पौष्टिक
भोजन और व्यायाम ही नहीं, बल्कि
पर्याप्त और नियमित नींद भी है।
क्या
नींद की कमी हमें बीमार बना सकती है? इसका
उत्तर है हाँ, और बहुत
गंभीर रूप से।
नींद की कमी केवल थकान नहीं है; यह हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, कमजोर इम्युनिटी, मानसिक विकार, अल्जाइमर और
कई अन्य गंभीर बीमारियों का
कारण बन सकती है। भारत में 59% लोग 6 घंटे से कम सोते हैं यह एक साइलेंट
एपिडेमिक है।
नींद को अपनी जीवनशैली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएँ।
अक्सर
पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न
1- क्या एक रात की नींद की कमी से
बीमारी हो सकती है?
उत्तर- हाँ, एक अध्ययन में पाया गया कि सिर्फ
24 घंटे की नींद की कमी युवा, स्वस्थ व्यक्तियों में
प्रतिरक्षा कोशिकाओं के प्रोफाइल को बदल सकती है। अगर ये परिवर्तन बने रहें तो
दीर्घकालिक सूजन और बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है।
प्रश्न
2- कितनी नींद पर्याप्त है?
उत्तर- 18-45 वर्ष
के वयस्कों को 6-8 घंटे, 45-70 वर्ष के लोगों को 5-7 घंटे, और 70 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को
लगभग 5 घंटे की नींद की आवश्यकता होती
है।
प्रश्न
3- नींद की कमी से कौन-कौन सी
बीमारियाँ हो सकती हैं?
उत्तर- नींद
की कमी से हृदय रोग, मधुमेह (टाइप
2), मोटापा, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक, चिंता, अवसाद, अल्जाइमर, पार्किंसंस, कमजोर
प्रतिरक्षा प्रणाली, और मेटाबोलिक
सिंड्रोम का
खतरा बढ़ जाता है।
प्रश्न
4- क्या नींद की कमी से वजन बढ़ता
है?
उत्तर- हाँ, नींद की कमी से ग्रेलिन (भूख बढ़ाने वाला हार्मोन) बढ़ता
है और लेप्टिन (भूख नियंत्रित करने वाला) कम
होता है,
जिससे अधिक भूख और
अत्यधिक भोजन की प्रवृत्ति पैदा होती है।
प्रश्न
5- भारत में कितने प्रतिशत लोग नींद
की कमी से पीड़ित हैं?
उत्तर: लगभग 59% भारतीय रात में 6 घंटे से कम नींद लेते हैं। 60% भारतीय वयस्क 6 घंटे से कम निर्बाध नींद लेते
हैं। 25.7% अनिद्रा से और 37.4% स्लीप एपनिया से पीड़ित हैं।
प्रश्न
6- क्या बच्चों में नींद की कमी
गंभीर है?
उत्तर- हाँ, बच्चों में नींद की कमी उनके संपूर्ण जीवन को प्रभावित करने वाली बीमारियों
का कारण बन सकती है। इससे भावनात्मक नियंत्रण, ध्यान अवधि और व्यवहार संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं।
प्रश्न
7- नींद की कमी को कैसे दूर करें?
उत्तर- नियमित
नींद का समय निर्धारित करें, सोने
से पहले डिजिटल डिवाइस से दूरी बनाएँ, आरामदायक
नींद का वातावरण बनाएँ, कैफीन
से बचें,
नियमित व्यायाम करें, और यदि आवश्यक हो तो
संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (CBT) लें।
प्रश्न
8- क्या नींद की कमी से इम्युनिटी
कमजोर होती है?
उत्तर- हाँ, नींद की कमी से प्रतिरक्षा
प्रणाली कमजोर हो
जाती है,
जिससे व्यक्ति
संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। नींद संबंधी विकार वाले लोगों में
ऑटोइम्यून बीमारियों का जोखिम 1.45 से
1.81 गुना अधिक होता है।