7156863209947891,DIRECT,fec0942fa0 क्या आप जानते हैं कि बढ़ती उम्र में हड्डियां कमजोर और खोखली क्यों हो जाती हैं?

क्या आप जानते हैं कि बढ़ती उम्र में हड्डियां कमजोर और खोखली क्यों हो जाती हैं?

 


क्या आप जानते हैं कि बढ़ती उम्र में हड्डियां

कमजोर और खोखली क्यों हो जाती हैं


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परिचय

जब हम जवान होते हैं, तो हमारी हड्डियां मजबूत, सघन और लचीली होती हैं। वे हमारे शरीर को सहारा देती हैं, अंगों की रक्षा करती हैं और गतिशीलता बनाए रखती हैं। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, कई लोगों को यह महसूस होने लगता है कि उनकी हड्डियां पहले जैसी मजबूत नहीं रहीं। उनमें दर्द रहता है, हल्की चोट लगने पर फ्रैक्चर (हड्डी टूटना) हो जाता है और अक्सर कद भी कुछ इंच कम हो जाता है। इसे ही चिकित्सा भाषा में ऑस्टियोपोरोसिस या 'हड्डियों का खोखला होना' कहते हैं। यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन अनियंत्रित होने पर यह खतरनाक साबित हो सकती है। आइए, इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझते हैं कि आखिर हड्डियां खोखली क्यों हो जाती हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है।

हड्डियों की संरचना और उनका लगातार बदलता स्वरूप



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हड्डियाँ केवल शरीर को सहारा देने वाली कठोर संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे जीवित ऊतक (Living Tissue) हैं जो लगातार बदलती और स्वयं को नवीनीकृत करती रहती हैं। हड्डियों की बाहरी परत सघन (Compact Bone) होती है, जो मजबूती प्रदान करती है, जबकि अंदर की स्पंजी (Spongy Bone) संरचना हल्कापन और लचीलापन बनाए रखती है। इनके भीतर अस्थि मज्जा (Bone Marrow) होती है, जहाँ रक्त कोशिकाओं का निर्माण होता है।

हड्डियों का स्वरूप जीवनभर स्थिर नहीं रहता। शरीर में दो प्रकार की कोशिकाएँ ऑस्टियोक्लास्ट (Osteoclasts) और ऑस्टियोब्लास्ट (Osteoblasts) पुरानी हड्डी को हटाने और नई हड्डी बनाने का कार्य करती हैं। इस प्रक्रिया को बोन रीमॉडलिंग (Bone Remodeling) कहा जाता है। व्यायाम, पोषण, हार्मोन और उम्र के अनुसार हड्डियों की घनता और मजबूती बदलती रहती है। यही कारण है कि हड्डियाँ चोट के बाद स्वयं को ठीक कर सकती हैं और शरीर की आवश्यकताओं के अनुरूप अपने आकार व संरचना में परिवर्तन कर सकती हैं।

हड्डी भी एक जीवित ऊतक है

अक्सर हम हड्डियों को मृत और ठोस ढांचे की तरह समझते हैं, जैसे कोई पत्थर का खंभा। लेकिन ऐसा नहीं है। हड्डी एक जीवित ऊतक है, जिसमें लगातार नई कोशिकाएं बनती हैं और पुरानी कोशिकाएं टूटती (रिसॉर्प्शन) हैं। इस प्रक्रिया को बोन रीमॉडलिंग कहते हैं। हमारे शरीर में दो प्रकार की कोशिकाएं इस काम को करती हैं  ऑस्टियोब्लास्ट (नई हड्डी बनाने वाली) और ऑस्टियोक्लास्ट (पुरानी हड्डी को तोड़ने वाली)। जवानी में यह प्रक्रिया संतुलित रहती है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ, ऑस्टियोक्लास्ट अधिक सक्रिय हो जाते हैं और ऑस्टियोब्लास्ट धीमे पड़ जाते हैं। नतीजा? हड्डी का घनत्व घटने लगता है और यह अंदर से 'खोखली' या 'छिद्रिल' हो जाती है। कल्पना कीजिए कि एक नया स्पंज मुलायम और घना होता है, लेकिन पुराने स्पंज में जितने छेद हो जाते हैं, वह कमजोर पड़ जाता है  बिल्कुल यही होता है हमारी हड्डियों के साथ।

उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों के खोखले होने के मुख्य कारण



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उम्र बढ़ने के साथ हड्डियाँ धीरे-धीरे अपनी घनता (Bone Density) खोने लगती हैं, जिससे वे कमजोर और खोखली हो सकती हैं। इसका मुख्य कारण हड्डियों के निर्माण और टूटने की प्रक्रिया में असंतुलन होना है। बढ़ती उम्र में नई हड्डी बनने की गति कम हो जाती है, जबकि पुरानी हड्डी का क्षय जारी रहता है। कैल्शियम और विटामिन D की कमी, हार्मोनल बदलाव (विशेषकर महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद एस्ट्रोजन की कमी), शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन और कुछ बीमारियाँ भी हड्डियों के कमजोर होने का जोखिम बढ़ाती हैं। इससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याएँ विकसित हो सकती हैं।

हार्मोनल परिवर्तन 

जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, खासकर महिलाओं में मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के बाद एस्ट्रोजेन हार्मोन का स्तर अचानक गिर जाता है। एस्ट्रोजेन हड्डियों की रक्षा करता है  यह ऑस्टियोक्लास्ट की गतिविधि को रोकता है। जब यह हार्मोन कम हो जाता है, तो हड्डियां तेजी से टूटने लगती हैं। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद पहले 5-7 सालों में हड्डियों का घनत्व 20% तक कम हो सकता है। पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर धीरे-धीरे घटता है, जिससे हड्डियों का निर्माण कम होता है। यही कारण है कि 60 साल की उम्र के बाद महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक होता है।

कैल्शियम और विटामिन डी की कमी

हमारी हड्डियां मुख्य रूप से कैल्शियम फॉस्फेट से बनी होती हैं। अगर शरीर में कैल्शियम की कमी होगी तो हड्डियां अपना ठोसपन कैसे बनाए रखेंगी? बुढ़ापे में अक्सर खान-पान ठीक नहीं होता, दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां कम खाई जाती हैं। लेकिन सिर्फ कैल्शियम लेने से काम नहीं चलता। कैल्शियम को अवशोषित (absorb) करने के लिए विटामिन डी चाहिए, जो सूर्य की रोशनी से मिलता है। उम्र बढ़ने के साथ लोग घरों में कैद हो जाते हैं, धूप नहीं लेते, जिससे विटामिन डी की कमी होती है। किडनी और लीवर की कार्यक्षमता भी कम होने लगती है, जो विटामिन डी को सक्रिय रूप में बदलते हैं। परिणामस्वरूप, भले ही आप कैल्शियम खूब लें, वह आपकी हड्डियों तक नहीं पहुंच पाता।

शारीरिक निष्क्रियता

हमारी हड्डियां उसी तरह काम करती हैं जैसे मांसपेशियां  'यूज इट ऑर लूज इट' (इस्तेमाल करो नहीं तो खो दो)। जब हम चलते-फिरते, दौड़ते, वजन उठाते हैं, तो हड्डियों पर दबाव पड़ता है, जिससे ऑस्टियोब्लास्ट सक्रिय होकर नई हड्डी बनाते हैं। लेकिन बुढ़ापे में अधिकतर लोग आराम पसंद करते हैं, बिस्तर या कुर्सी पर अधिक समय बिताते हैं, एक्सरसाइज नहीं करते। निष्क्रिय जीवनशैली हड्डियों को संकेत देती है कि अब उतनी मजबूती की जरूरत नहीं है, इसलिए ऑस्टियोक्लास्ट अधिक हड्डी तोड़ने लगते हैं। यही वजह है कि लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े मरीजों की हड्डियां बहुत जल्दी खोखली हो जाती हैं।

अन्य बीमारियां और दवाओं के दुष्प्रभाव

कई बार हड्डियों का खोखलापन किसी अन्य बीमारी की वजह से भी होता है, जैसे कि थायरॉइड की अति सक्रियता (हाइपरथायरायडिज्म), मधुमेह, रुमेटाइड अर्थराइटिस, किडनी की बीमारियां। कुछ दवाएं जैसे कि लंबे समय तक स्टेरॉयड (प्रेडनिसोलोन), एंटीकॉन्वल्सेंट, या कैंसर की दवाएं भी हड्डियों के नुकसान को तेज कर देती हैं। इसलिए जरूरी है कि बुढ़ापे में बिना डॉक्टर की सलाह कोई भी दवा न लें और अगर कोई पुरानी बीमारी है तो नियमित बोन डेंसिटी टेस्ट करवाते रहें।


हड्डियों के खोखले होने के चेतावनी भरे संकेत 



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हड्डियों के खोखले होने (ऑस्टियोपोरोसिस) के शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। जैसे-जैसे हड्डियाँ कमजोर होती हैं, कमर या पीठ में लगातार दर्द, शरीर की लंबाई में कमी, झुकी हुई मुद्रा (कुबड़ापन) और मामूली चोट या गिरने पर भी हड्डी टूट जाना प्रमुख संकेत हो सकते हैं। कुछ लोगों में कलाई, कूल्हे या रीढ़ की हड्डी में बार-बार फ्रैक्चर होने का खतरा बढ़ जाता है। मांसपेशियों की कमजोरी और संतुलन में कमी भी अप्रत्यक्ष संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर समय रहते चिकित्सकीय जांच कराना महत्वपूर्ण है।

पहचानें शुरुआती लक्षण


सबसे खतरनाक बात यह है कि ऑस्टियोपोरोसिस को 'साइलेंट डिजीज' (चुप रहने वाली बीमारी) कहा जाता है। सालों तक इसके कोई लक्षण नजर नहीं आते। जब तक आपको पता चलता है, तब तक काफी हड्डी कमजोर हो चुकी होती है। फिर भी कुछ संकेत हैं, जिन पर ध्यान देना चाहिए-


ऊंचाई का कम होना- अगर आप अपने 50 और 70 के दशक की ऊंचाई तुलना करें और 2-3 इंच या उससे अधिक की कमी पाएं, तो यह रीढ़ की हड्डियों के छोटे-छोटे फ्रैक्चर (वर्टिब्रल कंप्रेशन) का संकेत है।


झुकी हुई पीठ या 'विधवा का कूबड़' - रीढ़ की हड्डियां कमजोर होकर आगे की ओर झुक जाती हैं, जिससे पीठ गोल दिखने लगती है।

अचानक पीठ दर्द- बिना किसी चोट के पीठ में तेज दर्द होना, जो उठने-बैठने पर बढ़े – यह रीढ़ की हड्डी में छोटी दरार के कारण हो सकता है।

हल्की चोट पर हड्डी टूटना- जैसे छींकने या खांसने से पसली टूटना, या छोटी सी गिरावट से कलाई या कूल्हे में फ्रैक्चर हो जाना।

अगर आप या आपके घर के किसी बुजुर्ग में ये लक्षण दिखें, तो तुरंत बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) टेस्ट करवाएं।


हड्डियों को मजबूत रखने के उपाय



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हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली बहुत महत्वपूर्ण है। कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियाँ और तिल का नियमित सेवन करें। विटामिन D प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन कुछ समय धूप में रहें, क्योंकि यह कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है। नियमित व्यायाम, विशेषकर चलना, दौड़ना और वजन उठाने वाले व्यायाम, हड्डियों की घनता बढ़ाने में सहायक होते हैं। धूम्रपान और अत्यधिक शराब सेवन से बचें। पर्याप्त प्रोटीन, मैग्नीशियम और अन्य पोषक तत्वों का सेवन भी हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कैल्शियम और विटामिन डी का सेवन करें 

अपनी डाइट में कैल्शियम से भरपूर चीजें शामिल करें  दूध, दही, पनीर, रागी (नाचनी), तिल, बादाम, हरी सब्जियां (पालक, मेथी), सोयाबीन। लेकिन याद रखें, शरीर एक बार में केवल 500mg कैल्शियम ही अवशोषित कर पाता है, इसलिए कैल्शियम की गोली एक साथ न लेकर पूरे दिन छोटी-छोटी मात्रा में लें। इससे भी ज्यादा जरूरी है विटामिन डी। सुबह 10 से 2 बजे के बीच 20-30 मिनट धूप में जरूर बैठें। अगर धूप नहीं मिल पाती, तो डॉक्टर की सलाह से विटामिन डी सप्लीमेंट लें। साथ ही विटामिन K2 (फर्मेंटेड फूड – दही, छाछ, नटो) और मैग्नीशियम (कद्दू के बीज, पालक) भी हड्डियों के लिए बेहद जरूरी हैं।

व्यायाम करें

हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए दो तरह के व्यायाम जरूरी हैं-

1.  वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज – जिनमें आप अपने पैरों पर खड़े होकर जमीन पर दबाव डालते हैं, जैसे कि पैदल चलना, जॉगिंग, सीढ़ियां चढ़ना, नृत्य, रोप जंपिंग। ये हड्डियों को घना बनाते हैं।

2.  रेजिस्टेंस एक्सरसाइज – हल्के वजन उठाना, पुश-अप्स, स्क्वाट्स, योग के आसन (वृक्षासन, ताड़ासन, भुजंगासन)। ये मांसपेशियों और हड्डियों दोनों को स्ट्रेंथ देते हैं।

ध्यान रखें कि अगर आपको पहले से ही ऑस्टियोपोरोसिस है तो अत्यधिक झटका देने वाले व्यायाम (दौड़ना, कूदना) से बचें, डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह लें।

जीवनशैली में बदलाव

धूम्रपान से सीधे हड्डियों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है और एस्ट्रोजेन का स्तर कम होता है। अत्यधिक शराब पीने से कैल्शियम का अवशोषण बाधित होता है और फैलने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए इन दोनों आदतों को छोड़ना ही सबसे बड़ा उपाय है। इसके अलावा, कैफीन (चाय-कॉफी) और अधिक नमक भी हड्डियों से कैल्शियम बाहर निकालते हैं, इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में लें।

गिरने से बचें

बुढ़ापे में हड्डियां टूटने का सबसे बड़ा कारण घर पर फिसलना या गिरना है। सुनिश्चित करें कि घर में फर्श फिसलन रहित हो, बाथरूम में ग्रैब बार लगे हों, अच्छी रोशनी हो, और फर्श पर कोई तार या फैला हुआ सामान न हो। चलने के लिए जूते या चप्पल जिनमें अच्छी पकड़ हो, पहनें। अगर कमजोरी महसूस हो तो वॉकिंग स्टिक या वॉकर का उपयोग करने में कोई शर्म नहीं है।


क्या ऑस्टियोपोरोसिस को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है?

ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) को आमतौर पर पूरी तरह "ठीक" नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है और हड्डियों को और अधिक कमजोर होने से रोका जा सकता है। उपचार का मुख्य उद्देश्य हड्डियों की घनता (Bone Density) को बनाए रखना, फ्रैक्चर के जोखिम को कम करना और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है।

इसके लिए डॉक्टर कैल्शियम और विटामिन D की खुराक, विशेष दवाएँ तथा जीवनशैली में बदलाव की सलाह दे सकते हैं। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, धूम्रपान और अत्यधिक शराब से बचाव भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कुछ मामलों में दवाओं की मदद से हड्डियों की घनता में सुधार भी देखा जा सकता है।

यदि ऑस्टियोपोरोसिस का पता शुरुआती चरण में चल जाए और समय पर उपचार शुरू हो जाए, तो इसके प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसलिए नियमित जांच और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना बेहद महत्वपूर्ण है।


रोकथाम ही सबसे अच्छा इलाज

सच्चाई यह है कि एक बार जो हड्डी का घनत्व कम हो गया, उसे पूरी तरह से उतना घना बनाना मुश्किल है, खासकर बहुत अधिक उम्र में। लेकिन सही उपचार से हड्डियों का और अधिक क्षय रोका जा सकता है और फ्रैक्चर के खतरे को काफी कम किया जा सकता है। डॉक्टर कुछ दवाएं लिखते हैं, जैसे  बिस्फोस्फोनेट्स (एलेन्ड्रोनेट, राइजेड्रोनेट), हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT), स्ट्रोंटियम रैनेलेट आदि। लेकिन ये सभी दवाएं डॉक्टर की सख्त निगरानी में ही लें, क्योंकि इनके भी दुष्प्रभाव हो सकते हैं। सबसे कारगर तरीका है जवानी से ही हड्डियों का ख्याल रखना – 30 साल तक अधिकतम बोन डेंसिटी बनाना और 40 के बाद उसे ढहने से बचाना।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1- क्या सिर्फ महिलाओं को ही हड्डियां खोखली होने की समस्या होती है?

नहीं, पुरुष भी इससे पीड़ित हो सकते हैं। हालांकि महिलाओं में मेनोपॉज के बाद यह ज्यादा तेजी से होता है, लेकिन 70 साल की उम्र के बाद पुरुषों में भी उतना ही जोखिम बढ़ जाता है।

प्रश्न 2- हड्डियों की जांच कैसे होती है?
सबसे प्रचलित और सटीक जांच है DXA (Dual-energy X-ray absorptiometry) स्कैन। इसमें रीढ़, कूल्हे और कलाई की हड्डियों का घनत्व मापा जाता है। दर्द रहित और कुछ मिनटों में होने वाली यह जांच हर बुजुर्ग को कम से कम एक बार करवानी चाहिए।

प्रश्न 3- क्या हड्डियों के लिए कैल्शियम की गोलियां लेना सुरक्षित है?
जिन लोगों को डाइट से पर्याप्त कैल्शियम नहीं मिल पाता, उनके लिए गोलियां फायदेमंद हैं। लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह ज्यादा मात्रा (2000mg से अधिक) न लें  इससे किडनी में पथरी या हार्ट की समस्या हो सकती है। प्राकृतिक स्रोत हमेशा बेहतर होते हैं।

प्रश्न 4- क्या योग और प्राणायाम से हड्डियां मजबूत हो सकती हैं?
बिल्कुल। योग के आसन जैसे ताड़ासन, वृक्षासन, त्रिकोणासन, और भुजंगासन हड्डियों पर सही दबाव डालते हैं। सूर्य नमस्कार तो पूरे शरीर की हड्डियों के लिए वरदान है। ध्यान रखें कि ऑस्टियोपोरोसिस होने पर आगे की ओर झुकने वाले आसन (जैसे पश्चिमोत्तानासन) बिना ट्रेनर के न करें  इससे रीढ़ पर दबाव बढ़ सकता है।

प्रश्न 5- क्या बच्चों या युवाओं को भी हड्डियां खोखली होने का खतरा होता है?
हां, कुछ दुर्लभ मामलों में जुवेनाइल ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है। इसके अलावा लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले युवा, एनोरेक्सिया नर्वोसा (खाने का विकार) से पीड़ित, या अत्यधिक शराब-धूम्रपान करने वाले युवाओं की हड्डियां भी समय से पहले कमजोर हो सकती हैं। इसलिए अच्छी आदतें किसी भी उम्र में शुरू करें।

प्रश्न 6- क्या नारियल पानी या अंजीर हड्डियों के लिए अच्छे हैं?
हां, नारियल पानी में इलेक्ट्रोलाइट्स और कैल्शियम दोनों होते हैं। अंजीर (अंजीर) में भी कैल्शियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में होता है  ये दोनों ही ऑस्टियोपोरोसिस से बचाने में सहायक हैं।

निष्कर्ष

दोस्तों, हड्डियों का खोखला होना कोई रातों-रात होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह धीरे-धीरे बीतते वक्त के साथ हमारी अनदेखी का परिणाम होती है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि हम अभी भी अपनी हड्डियों को बचा सकते हैं, चाहे हमारी उम्र कोई भी हो। जरूरत है तो बस थोड़ी सी सजगता, सही पोषण, नियमित व्यायाम और सकारात्मक जीवनशैली की। अगर आपके घर में कोई बुजुर्ग है तो उनकी हड्डियों का ख्याल रखना आपका कर्तव्य है। उन्हें धूप में ले जाएं, पौष्टिक भोजन दें, और उन्हें एक्टिव रहने के लिए प्रेरित करें।

याद रखिए  जवानी में बनाई गई मजबूत हड्डियां ही बुढ़ापे में आपका सहारा बनती हैं। तो आज ही अपनी डाइट में कैल्शियम और विटामिन डी बढ़ाएं, रोज कम से कम 30 मिनट टहलें, और अपने डॉक्टर से नियमित जांच करवाते रहें। एक मजबूत हड्डी वाला शरीर ही सच्चा सुखद बुढ़ापा देता है।

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