क्या एलर्जी
हानिरहित चीज के प्रति शरीर की अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया है?
दोस्तों, क्या
आपने कभी सोचा है कि किसी व्यक्ति को मूंगफली खाने से सांस लेने में तकलीफ क्यों
होने लगती है, जबकि दूसरा व्यक्ति बिना किसी परेशानी के
किलोभर मूंगफली खा जाता है? या फिर किसी को गुलाब का फूल छूने से ही
हाथों पर लाल चकत्ते क्यों पड़ जाते हैं? आखिर
ऐसा क्यों होता है कि हमारे आस-पास मौजूद सामान्य से सामान्य चीजें जैसे
धूल के कण, परागकण, कुछ
खाद्य पदार्थ या दवाइयां कुछ लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन जाती
हैं, जबकि अधिकांश लोगों के लिए ये पूरी तरह
हानिरहित होती हैं?
यह सवाल सीधे तौर पर एलर्जी की मूल परिभाषा से जुड़ा है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, एलर्जी वास्तव में हानिरहित या सामान्यतः हानि न पहुंचाने वाले पदार्थों के प्रति शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया ही है। लेकिन क्या यह परिभाषा पूरी तरह सटीक है? क्या हर एलर्जी सिर्फ "हानिरहित" चीजों से होती है? आइए इस विषय पर विस्तार से, पैराग्राफ दर पैराग्राफ, एक साधारण भाषा में और गहराई से समझने की कोशिश करते हैं
अगर मैं आपसे बिल्कुल सरल शब्दों में कहूँ
तो एलर्जी हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली (इम्यून सिस्टम) की वह गलती है, जब वह किसी नुकसान न पहुँचाने वाले बाहरी
पदार्थ को खतरनाक दुश्मन समझ लेती है। सामान्य स्थिति में हमारा इम्यून सिस्टम
बैक्टीरिया, वायरस, फंगस
या अन्य रोगजनकों पर हमला करता है। लेकिन एलर्जी में यही सिस्टम परागकण, धूल के कण, पालतू
जानवरों की रूसी, कुछ खाद्य प्रोटीन, या दवाओं जैसे पदार्थों को भी
"खतरा" करार दे देता है। इन पदार्थों को एलर्जेन (Allergen) कहते हैं। यह एक प्रकार की अतिसंवेदनशीलता प्रतिक्रिया (Hypersensitivity Reaction) है, जिसे
मेडिकल भाषा में टाइप-1 अतिसंवेदनशीलता कहा जाता है। यानी शरीर की
प्रतिक्रिया उस चीज के मुकाबले बहुत ज्यादा, अति-गहन
और अनुपातहीन होती है।
हम हानिरहित चीजों को दुश्मन क्यों समझ बैठते है?
अब यह सबसे दिलचस्प सवाल है कि आखिर शरीर
की यह "गलत पहचान" होती क्यों है? इसके
पीछे कई सिद्धांत हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसमें आनुवंशिकी और पर्यावरण
दोनों की भूमिका होती है। कुछ लोग जन्म से ही एलर्जी की प्रवृत्ति (एटोपी) लेकर
पैदा होते हैं। उनका इम्यून सिस्टम Th2 प्रकार
की प्रतिक्रिया देने के लिए पहले से प्रोग्राम्ड होता है, जो IgE एंटीबॉडीज
बनाने में विशेषज्ञ होती है। लेकिन सिर्फ आनुवंशिकी ही काफी नहीं है।
"स्वच्छता परिकल्पना" (Hygiene Hypothesis) नामक एक प्रचलित सिद्धांत कहता है कि आज
के अत्यधिक स्वच्छ वातावरण में हमारा इम्यून सिस्टम बचपन में पर्याप्त संक्रमणों
और रोगाणुओं के संपर्क में नहीं आता, जिससे
वह सही तरह से परिपक्व नहीं हो पाता। नतीजतन, वह
हानिरहित चीजों पर ही अनावश्यक हमला करने लगता है। आप इसे इस तरह समझिए जिस
सुरक्षाकर्मी ने कभी वास्तविक चोर न देखा हो, वह
हर सामान्य आदमी को चोर समझने लगता है। बिल्कुल ऐसा ही हमारा इम्यून सिस्टम करता
है।
अतिसंवेदनशीलता का वैज्ञानिक आधार
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह
प्रक्रिया बहुत सुनियोजित है। जब कोई एलर्जेन पहली बार शरीर में प्रवेश करता है
(जैसे परागकण सांस के जरिए), तो शरीर की विशेष
कोशिकाएं (एंटीजन प्रेजेंटिंग सेल्स) इसे पहचानकर B-लिम्फोसाइट्स
नामक कोशिकाओं तक ले जाती हैं। ये B-कोशिकाएं
उस एलर्जेन के खिलाफ विशेष IgE प्रकार के एंटीबॉडी
बनाने लगती हैं। ये IgE एंटीबॉडी फिर मस्त कोशिकाओं (Mast Cells) और बेसोफिल्स से जुड़ जाते हैं। अब मस्त
कोशिकाएं "सशस्त्र" हो चुकी होती हैं। जब वही एलर्जेन दूसरी बार शरीर
में प्रवेश करता है, तो वह इन IgE एंटीबॉडीज
से बंध जाता है, जिससे मस्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं
और हिस्टामाइन, ल्यूकोट्राइन जैसे रासायनिक पदार्थ छोड़ती हैं। यही
हिस्टामाइन है जो एलर्जी के सभी क्लासिक लक्षणों जैसे नाक बहना, आंखों
में खुजली, छींक आना, त्वचा
पर लाल चकत्ते, सूजन के
लिए जिम्मेदार होता है। यह पूरी प्रक्रिया कुछ ही सेकंड या मिनटों में घटित हो
जाती है, इसलिए कई एलर्जी तत्काल होती हैं।
एलर्जी के सामान्य ट्रिगर
अब सवाल यह है कि आखिर वे कौन से
"हानिरहित" पदार्थ हैं जो एलर्जी का कारण बनते हैं? सूची बहुत लंबी है। सबसे आम एलर्जेन में
शामिल हैं: परागकण (घास, पेड़, खरपतवार
से), धूल के कण (माइट्स जो गद्दों, तकियों, कालीनों
में पनपते हैं), फफूंदी के बीजाणु, पालतू जानवरों की रूसी (बिल्ली, कुत्ते), कॉकरोच का मल, कुछ खाद्य पदार्थ (मूंगफली, ट्री नट्स, दूध, अंडे, गेहूं, सोया, मछली, शेलफिश), कीट के डंक (मधुमक्खी, ततैया), और दवाइयां (पेनिसिलिन, एस्पिरिन, सल्फा ड्रग्स)। गौर करने वाली बात यह है
कि इनमें से अधिकतर चीजें 99% लोगों के लिए बिल्कुल सुरक्षित हैं। एक
गिलास दूध पीना या मूंगफली खाना आमतौर पर जीवन के सबसे सामान्य क्रियाकलाप हैं।
लेकिन एलर्जी पीड़ित के लिए ये जानलेवा साबित हो सकते हैं। क्या यह अतिसंवेदनशीलता
नहीं है? बिल्कुल है।
क्या एलर्जी हमेशा हानिरहित चीजों से ही
होती है?
यहाँ एक बारीक बात समझ लेनी चाहिए। जब हम
"हानिरहित" शब्द का प्रयोग करते हैं, तो
इसका मतलब है कि वह पदार्थ सामान्यतः या अधिकांश लोगों के लिए हानिरहित है। लेकिन क्या ऐसा कोई पदार्थ
है जो बिल्कुल शून्य प्रतिशत खतरनाक हो? शायद
नहीं। उदाहरण के लिए, धूल के कण (माइट्स) बहुत छोटे जीव हैं जो
आमतौर पर कोई बीमारी नहीं फैलाते, लेकिन बहुत ज्यादा
मात्रा में कुछ लोगों में अस्थमा ट्रिगर कर सकते हैं। फिर भी, एलर्जी की परिभाषा के अनुसार, ये पदार्थ इम्यूनोलॉजिकल रूप से हानिरहित होते हैं – इनमें
वे गुण नहीं होते जो सीधे ऊतकों को नुकसान पहुँचाएँ। नुकसान तो शरीर की अपनी
प्रतिक्रिया से होता है। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि कभी-कभी एलर्जी उन चीजों से भी
हो सकती है जो थोड़ी मात्रा में विषैली होती हैं, जैसे
आइवी पॉइजन। लेकिन एलर्जी प्रतिक्रिया वहाँ भी अतिरंजित होती है। तो मोटे तौर पर, हाँ, एलर्जी को हानिरहित चीजों के प्रति अतिसंवेदनशीलता
कहना उचित है।
एलर्जी और ऑटोइम्यून बीमारी में अंतर
यहाँ एक भ्रम को दूर करना जरूरी है। बहुत
से लोग एलर्जी और ऑटोइम्यून बीमारी (जैसे रुमेटाइड अर्थराइटिस, ल्यूपस, टाइप-1 डायबिटीज) को एक ही समझ लेते हैं। दोनों
में अंतर है। एलर्जी में प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी, हानिरहित पदार्थों पर
हमला करती है। जबकि ऑटोइम्यून बीमारी में प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर के अपने ही ऊतकों और कोशिकाओं को दुश्मन समझकर नष्ट करने लगती है। यानी
एलर्जी में दुश्मन "बाहर" से आता है (हालाँकि वह असली दुश्मन नहीं है), जबकि ऑटोइम्यून में दुश्मन
"भीतर" ही होता है (शरीर का अपना हिस्सा)। दोनों ही अतिसंवेदनशीलता के
प्रकार हैं, लेकिन लक्ष्य अलग है। इसलिए एलर्जी को सही
मायने में "बाहरी हानिरहित एजेंटों के प्रति अतिसंवेदनशीलता" कहा जा
सकता है।
एलर्जी के लक्षण
एलर्जी के लक्षण उस अंग पर निर्भर करते
हैं जहाँ एलर्जेन संपर्क करता है। अगर एलर्जेन सांस के जरिए आता है (जैसे परागकण), तो लक्षण नाक, साइनस और फेफड़ों में होंगे छींक, नाक बहना, नाक
बंद होना, आंखों से पानी आना, खांसी, घरघराहट, सांस लेने में कठिनाई। अगर त्वचा के
संपर्क में आता है, तो पित्ती (Urticaria), एक्जिमा, खुजली, लाल चकत्ते। अगर खाने के जरिए आता है, तो मुंह में झुनझुनी, होंठ, जीभ, चेहरे या गले की सूजन, पेट दर्द, दस्त, उल्टी। और अगर कीट के डंक से एलर्जी हो, तो डंक वाली जगह पर बड़ी सूजन, पूरे शरीर पर खुजली, खांसी, सीने
में जकड़न। सबसे गंभीर रूप है एनाफिलैक्सिस एक तीव्र, पूरे
शरीर को प्रभावित करने वाली प्रतिक्रिया जिसमें ब्लड प्रेशर अचानक गिर जाता है, सांस नली सिकुड़ जाती है, दिल की धड़कन अनियमित हो जाती है और यह
जानलेवा हो सकता है। यह उसी "हानिरहित" चीज के प्रति शरीर की चरम
अतिसंवेदनशीलता का उदाहरण है।
क्या एलर्जी का इलाज संभव है?
अच्छी खबर यह है कि एलर्जी का प्रबंधन
संभव है, हालाँकि कई बार यह पूरी तरह ठीक नहीं
होती। सबसे पहला उपाय है एलर्जेन से बचाव। अगर आपको धूल से एलर्जी है, तो HEPA फिल्टर
वाले वैक्यूम क्लीनर का उपयोग करें, बार-बार
चादरें धोएं। अगर परागकण से है, तो मौसम के अनुसार
मास्क पहनें। दूसरा, दवाइयां एंटीहिस्टामाइन (लोराटाडिन, सेटीरिजिन) खुजली और छींक से राहत दिलाते
हैं, नेज़ल कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स नाक की सूजन कम
करते हैं, डिकॉन्गेस्टेंट नाक खोलते हैं। गंभीर
एलर्जी के लिए एपिनेफ्रिन ऑटो-इंजेक्टर (EpiPen) जीवनरक्षक
होता है। तीसरा, इम्यूनोथेरेपी एलर्जी शॉट्स या सब्लिंगुअल टैबलेट्स के
जरिए धीरे-धीरे शरीर को एलर्जेन के प्रति सहनशील बनाया जाता है। यह एक लंबी
प्रक्रिया है लेकिन कई मामलों में यह एलर्जी को स्थायी रूप से कम कर सकती है। यह
इस बात का सबूत है कि अतिसंवेदनशीलता को संशोधित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
तो दोस्तों, इस
पूरे विस्तृत विश्लेषण के बाद हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि एलर्जी निस्संदेह हानिरहित चीजों के प्रति
शरीर की अतिसंवेदनशील प्रतिक्रिया है। यह
हमारी रोग प्रतिरोधक प्रणाली की एक भूल है, एक
गलत अलार्म है, जहाँ वह मूंगफली, धूल, पराग
या दूध जैसी सामान्य चीजों को जानलेवा खतरा समझ बैठती है। यह अतिसंवेदनशीलता हल्की
खुजली से लेकर जानलेवा एनाफिलैक्सिस तक कुछ भी हो सकती है। यह स्थिति लाखों लोगों
को प्रभावित करती है और आधुनिक जीवनशैली के कारण इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
हालाँकि, सही जानकारी, बचाव के उपायों और चिकित्सीय सहायता से
एलर्जी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि आपको या आपके किसी परिचित को बार-बार
बिना किसी स्पष्ट कारण के एलर्जी के लक्षण होते हैं, तो
कृपया किसी एलर्जी विशेषज्ञ (एलर्जिस्ट) से संपर्क करें। सही जांच के बाद ही पता
चल पाता है कि आखिर आपका शरीर किस हानिरहित चीज से इतना अधिक आहत हो रहा है। याद
रखें, ज्ञान ही सबसे बड़ा बचाव है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1- क्या
एलर्जी पूरी तरह से ठीक हो सकती है या यह जीवनभर रहती है?
उत्तर- यह एलर्जी
के प्रकार और व्यक्ति पर निर्भर करता है। बचपन में दूध, अंडे या सोया से एलर्जी अक्सर बढ़ती उम्र
में खत्म हो जाती है। लेकिन मूंगफली, ट्री
नट्स, मछली और शेलफिश से एलर्जी आमतौर पर जीवनभर
रहती है। परागकण और धूल के कण से एलर्जी भी वर्षों तक बनी रह सकती है, हालाँकि इम्यूनोथेरेपी से इसमें सुधार
संभव है।
प्रश्न 2- क्या
एलर्जी वंशानुगत होती है?
उत्तर- हाँ, एलर्जी की प्रवृत्ति (एटोपी) आनुवंशिक रूप
से माता-पिता से बच्चों में आ सकती है। यदि माता-पिता दोनों को एलर्जी है, तो बच्चे को एलर्जी होने की संभावना 60-80% तक हो जाती है। हालाँकि, यह जरूरी नहीं कि बच्चे को वही एलर्जी
होगी जो माता-पिता को है; एलर्जेन अलग हो सकता है।
प्रश्न 3- क्या
एलर्जी और असहिष्णुता (इंटॉलरेंस) एक ही चीज है?
उत्तर- बिल्कुल
नहीं, ये दोनों अलग हैं। एलर्जी में प्रतिरक्षा
प्रणाली शामिल होती है और यह तत्काल होती है, जबकि
असहिष्णुता (जैसे लैक्टोज इंटॉलरेंस) में पाचन तंत्र किसी पदार्थ को तोड़ नहीं
पाता, इसमें इम्यून सिस्टम शामिल नहीं होता।
असहिष्णुता में लक्षण आमतौर पर हल्के होते हैं (गैस, सूजन, दस्त) और जानलेवा नहीं होते।
प्रश्न 4- क्या
एलर्जी किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है?
उत्तर: हाँ, हालाँकि अधिकतर एलर्जी बचपन या युवावस्था
में शुरू होती है, लेकिन यह किसी भी उम्र में विकसित हो सकती
है। कई वयस्कों को 30, 40 या 50 की
उम्र में अचानक नई एलर्जी होने लगती है। इसके पीछे हार्मोनल बदलाव, तनाव, बीमारी
या नए वातावरण के संपर्क में आना हो सकता है।
प्रश्न 5- क्या
एलर्जी के लिए घरेलू उपचार कारगर होते हैं?
उत्तर- हल्की
एलर्जी (जैसे मौसमी एलर्जी) में घरेलू उपचार जैसे
नमक के पानी से नाक साफ करना, शहद का सेवन, भाप लेना, हल्दी
वाला दूध राहत
दे सकते हैं। लेकिन ये वैज्ञानिक उपचार का विकल्प नहीं हैं। गंभीर एलर्जी या
एनाफिलैक्सिस में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और एपिनेफ्रिन का प्रयोग करें। कभी
भी घरेलू नुस्खों पर अत्यधिक निर्भर न रहें।
प्रश्न 6- क्या
एलर्जी से ग्रस्त व्यक्ति को टीके लगवाने में कोई खतरा है?
उत्तर- आमतौर पर
नहीं। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को किसी टीके के किसी घटक (जैसे जिलेटिन, एंटीबायोटिक्स, या पिछली खुराक से) से पहले गंभीर एलर्जी
हुई हो, तो डॉक्टर से परामर्श जरूरी है। COVID-19 टीकों के मामले में पॉलीइथिलीन ग्लाइकॉल
से दुर्लभ एलर्जी देखी गई है। इसलिए टीका लगवाने से पहले अपनी एलर्जी के बारे में
डॉक्टर को अवश्य बताएं।

