क्या आपके शरीर में बैक्टीरिया कोशिकाओं की संख्या मानव कोशिकाओं से ज्यादा होती है?
जब भी हम अपने शरीर की
संरचना के बारे में गहराई से सोचते हैं, तो हमारे मन में एक
बुनियादी सवाल आता है हम वास्तव में किससे बने
हैं? हम
खुद को एक अकेला इंसान समझते हैं, लेकिन विज्ञान हमें बताता है कि हमारा शरीर एक संपूर्ण ब्रह्मांड है। इस
ब्रह्मांड में खरबों कोशिकाएँ निवास करती हैं, लेकिन हैरानी वाली बात यह
है कि इनमें से अधिकांश कोशिकाएँ हमारी अपनी नहीं होतीं। जी हाँ, आपने सही सुना। हमारे शरीर
के अंदर और बाहर ऐसे असंख्य सूक्ष्मजीव रहते हैं, जिनकी संख्या को लेकर दशकों
से एक धारणा प्रचलित है कि ये हमारी अपनी मानव
कोशिकाओं से दस गुना अधिक हैं। लेकिन क्या यह धारणा सच है? क्या आपके शरीर में
बैक्टीरिया कोशिकाओं की संख्या सचमुच मानव कोशिकाओं से ज्यादा है? आज के इस विस्तृत लेख में
हम इसी प्रश्न की पड़ताल करेंगे, विज्ञान की नवीनतम खोजों को समझेंगे, और जानेंगे कि आखिर यह
अनुपात क्या है और इसका हमारे स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
कहाँ से आया 10:1 का मिथक?
यदि आपने कभी विज्ञान की
कोई लोकप्रिय पुस्तक पढ़ी है या कोई डॉक्यूमेंट्री देखी है, तो आपने यह दावा अवश्य सुना
होगा कि हमारे शरीर में बैक्टीरिया की संख्या हमारी अपनी कोशिकाओं से दस गुना अधिक
है। यह अनुपात, जिसे
10:1 के
नाम से जाना जाता है, दशकों
से वैज्ञानिक साहित्य और लोकप्रिय मीडिया में दोहराया जाता रहा है। लेकिन क्या
आपने कभी सोचा है कि यह आँकड़ा आया कहाँ से? इसका उद्गम 1970 के दशक में हुआ, जब सूक्ष्म जीवविज्ञानी डॉ.
थॉमस लक्की ने एक अनुमान लगाया कि मानव शरीर में लगभग 100 खरब (ट्रिलियन) बैक्टीरिया
होते हैं, जबकि
मानव कोशिकाओं की संख्या लगभग 10 खरब थी। यह अनुमान तब के उपलब्ध सीमित डेटा और औसतन गणनाओं पर आधारित था।
समय के साथ, यह
आँकड़ा एक स्थापित तथ्य की तरह प्रचलित हो गया, बिना इसकी गहराई से समीक्षा
किए। वैज्ञानिक समुदाय में भी इसे बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लिया गया, और यह एक मान्यता बन गई कि
मनुष्य केवल 10% मानव
कोशिकाओं से बना है, शेष 90% तो बैक्टीरिया हैं।
अनुपात का नवीनतम वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन
हाल के वर्षों में विज्ञान
ने बहुत तेज़ी से प्रगति की है। 2016 में, इज़राइल
के वीज़मैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिकों रॉन सेडर और शै फुक्समैन ने एक
ऐतिहासिक अध्ययन किया। उन्होंने पुराने अनुमानों को धूल चटाते हुए, आधुनिक तकनीकों जैसे कि
चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (MRI) और
हिस्टोलॉजिकल (ऊतकीय) गणनाओं के आधार पर एक नया और अधिक सटीक अनुपात स्थापित किया।
उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले थे।
उनके अनुसार, एक औसत वयस्क मानव (70 किलोग्राम वजनी, 30-50 वर्ष की आयु का पुरुष) के
शरीर में कुल मानव कोशिकाओं की संख्या लगभग 30 खरब होती है। दूसरी ओर, बैक्टीरिया की संख्या लगभग 39 खरब होती है। यानी अनुपात लगभग 1.3:1 है, न कि 10:1। इस शोध ने पुरानी धारणा
को पूरी तरह से पलट कर रख दिया। अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि हमारे शरीर में
बैक्टीरिया और मानव कोशिकाएँ लगभग बराबर संख्या में हैं। कुछ अध्ययनों में तो यह
भी सामने आया है कि किसी व्यक्ति विशेष के आधार पर यह अनुपात 1:1 के आसपास ही रहता है, कभी बैक्टीरिया थोड़े अधिक
तो कभी मानव कोशिकाएँ थोड़ी अधिक।
बैक्टीरिया
केवल आंत तक ही सीमित नहीं हैं
जब हम शरीर में बैक्टीरिया
की बात करते हैं, तो
अक्सर हमारा ध्यान सीधे आंत (गट) की ओर चला जाता है। यह सच है कि हमारी आंत
सूक्ष्मजीवों का सबसे बड़ा भंडार है। बृहदान्त्र (कोलन) में अकेले खरबों
बैक्टीरिया निवास करते हैं, जो
भोजन के पाचन, विटामिन
के संश्लेषण और प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते हैं। लेकिन बैक्टीरिया केवल आंत तक ही सीमित नहीं हैं। हमारी त्वचा पर, मुँह में, नाक के अंदर, फेफड़ों में, जननांग क्षेत्र में हर उस जगह पर जहाँ बाहरी
वातावरण से संपर्क होता है, वहाँ
बैक्टीरिया की एक अनूठी कॉलोनी पाई जाती है।
त्वचा पर तो स्थिति और भी
रोचक है। हमारी त्वचा की प्रत्येक वर्ग सेंटीमीटर पर लाखों बैक्टीरिया रहते हैं, जो हमारे पसीने, तेल और मृत कोशिकाओं पर
जीवित रहते हैं। ये बैक्टीरिया हमारे लिए हानिकारक नहीं होते, बल्कि हानिकारक रोगाणुओं से
हमारी रक्षा करते हैं। इसी प्रकार, मुँह में सैकड़ों
प्रजातियों के बैक्टीरिया होते हैं, जो भोजन के पाचन की शुरुआत
करते हैं और दांतों की सुरक्षा में सहायक होते हैं। इस प्रकार, बैक्टीरिया हमारे शरीर का
एक अभिन्न अंग हैं, न कि
केवल आकस्मिक मेहमान।
मानव
कोशिकाओं की गणना कैसे की जाती है?
यह जानना भी उतना ही रोचक
है कि वैज्ञानिक यह निर्धारित कैसे करते हैं कि हमारे शरीर में कितनी मानव
कोशिकाएँ हैं। यह कोई सीधा-सादा कार्य नहीं है, क्योंकि हमारे शरीर में
विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं लाल रक्त कोशिकाएँ, मांसपेशी कोशिकाएँ, तंत्रिका कोशिकाएँ, त्वचा कोशिकाएँ, और भी बहुत कुछ। इनमें से
प्रत्येक का आकार और द्रव्यमान अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए, लाल रक्त कोशिकाएँ अत्यधिक
छोटी होती हैं और शरीर में इनकी संख्या सबसे अधिक होती है लगभग 20 से 30 खरब। जबकि मांसपेशी
कोशिकाएँ बहुत बड़ी होती हैं, लेकिन इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।
वैज्ञानिक विभिन्न ऊतकों के
नमूने लेते हैं, उनमें
कोशिकाओं की संख्या गिनते हैं, और फिर पूरे शरीर के लिए एक्सट्रपलेशन (अनुमान) करते हैं। नवीनतम अध्ययनों
में, शोधकर्ताओं
ने प्रत्येक अंग के द्रव्यमान और उसमें प्रति ग्राम कोशिकाओं की संख्या का विस्तृत
मानचित्रण किया। इसी विधि से यह निष्कर्ष निकाला गया कि मानव कोशिकाओं की कुल
संख्या 30 खरब
के आसपास है। इसमें लाल रक्त कोशिकाओं का योगदान सबसे अधिक है, जो कुल मानव कोशिकाओं का
लगभग 80% हिस्सा
होती हैं।
बैक्टीरिया
की संख्या का अनुमान कैसे लगाया जाता है?
बैक्टीरिया की संख्या का
अनुमान लगाना भी उतना ही जटिल है। पहले यह माना जाता था कि आंत में बैक्टीरिया की
संख्या 100 खरब
है, लेकिन
यह अनुमान इस धारणा पर आधारित था कि मल के प्रति ग्राम में बैक्टीरिया की एक
निश्चित संख्या होती है और पूरी आंत में इसका औसत लगाया गया। नए अध्ययनों में यह
पाया गया कि बैक्टीरिया की संख्या आंत के विभिन्न हिस्सों में भिन्न-भिन्न होती
है। बृहदान्त्र में बैक्टीरिया की सघनता सबसे अधिक होती है, जबकि छोटी आंत में यह
अपेक्षाकृत कम होती है।
इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने यह भी ध्यान
में रखा कि मल में पाई जाने वाली बैक्टीरिया की संख्या और आंत की दीवार से जुड़े
बैक्टीरिया की संख्या में अंतर होता है। नवीनतम गणनाओं के अनुसार, पूरे शरीर में बैक्टीरिया
की कुल संख्या लगभग 39 खरब
है, जो
पहले के 100 खरब
के अनुमान से काफी कम है। यह परिवर्तन गणना विधियों में सुधार और अधिक सटीक मॉडलों
के उपयोग के कारण संभव हुआ।
क्या
केवल संख्या ही मायने रखती है?
यदि हम केवल संख्या की बात
करें, तो
अनुपात लगभग 1.3:1 (बैक्टीरिया:
मानव कोशिकाएँ) है। लेकिन यदि हम द्रव्यमान की बात करें, तो स्थिति बिल्कुल भिन्न हो
जाती है। एक मानव कोशिका का आकार एक जीवाणु कोशिका की तुलना में सैकड़ों गुना बड़ा
होता है। औसतन, एक
मानव कोशिका का द्रव्यमान एक जीवाणु कोशिका के द्रव्यमान से लगभग 1000 गुना अधिक होता है। यानी
संख्या में बैक्टीरिया भले ही थोड़े अधिक हों, लेकिन द्रव्यमान के मामले
में हमारी अपनी कोशिकाएँ भारी पड़ती हैं।
एक औसत वयस्क में सभी
बैक्टीरिया का कुल द्रव्यमान लगभग 0.2 से 0.5 किलोग्राम के बीच होता है।
यह हमारे कुल शरीर के वजन का लगभग 0.5% से 1% ही होता है। इसकी तुलना में, हमारी मानव कोशिकाओं का
द्रव्यमान लगभग 60-70 किलोग्राम
होता है। यह तथ्य और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें बताता है कि भले ही
बैक्टीरिया संख्या में हमसे कम न हों, लेकिन शारीरिक संरचना में
उनका स्थान बहुत छोटा है। वे हमारे शरीर के एक छोटे लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली अंग
की तरह कार्य करते हैं।
माइक्रोबायोम
का महत्व
अब प्रश्न यह उठता है कि
यदि अनुपात 10:1 नहीं
है, तो
क्या यह जानकारी हमारे स्वास्थ्य के प्रति हमारे दृष्टिकोण को बदल देती है? निश्चित रूप से नहीं।
वास्तविकता यह है कि बैक्टीरिया की सटीक संख्या उनके महत्व को कम नहीं करती। हमारा
माइक्रोबायोम अर्थात हमारे शरीर में रहने
वाले सभी सूक्ष्मजीवों का समुदाय हमारे स्वास्थ्य के लिए
उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हमारा कोई प्रमुख अंग।
ये बैक्टीरिया हमारे पाचन
तंत्र को सुचारु रूप से चलाने में मदद करते हैं। वे उन जटिल कार्बोहाइड्रेट्स को
तोड़ते हैं जिन्हें हमारा शरीर स्वयं पचा नहीं सकता। वे विटामिन K, विटामिन B12, राइबोफ्लेविन और थायमिन
जैसे आवश्यक विटामिनों का संश्लेषण करते हैं। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को
प्रशिक्षित करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जन्म के समय, एक शिशु की प्रतिरक्षा
प्रणाली अपरिपक्व होती है। जैसे-जैसे वह बैक्टीरिया के संपर्क में आता है, उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली
विकसित होती है और यह सीखती है कि किन चीज़ों से लड़ना है और किन्हें सहन करना है।
हाल के वर्षों में शोध से
पता चला है कि माइक्रोबायोम में असंतुलन (डिस्बायोसिस) कई बीमारियों से जुड़ा हुआ
है, जिनमें
मोटापा, मधुमेह
टाइप 2, सूजन
आंत्र रोग (IBD), अस्थमा, एलर्जी, और यहाँ तक कि अवसाद और
चिंता जैसे मानसिक विकार भी शामिल हैं। यह तथाकथित 'गट-ब्रेन एक्सिस' (आंत-मस्तिष्क अक्ष) आधुनिक
चिकित्सा विज्ञान का एक अत्यंत रोचक क्षेत्र है, जो बताता है कि हमारी आंत
के बैक्टीरिया हमारे मूड, व्यवहार
और संज्ञानात्मक कार्यों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
क्या
हम बैक्टीरिया से अलग रह सकते हैं?
यह प्रश्न कि क्या हम
बैक्टीरिया से रहित जीवन जी सकते हैं, अब विज्ञान के दायरे में
केवल एक काल्पनिक प्रश्न रह गया है। ऐसा जीवन संभव नहीं है। बिना बैक्टीरिया के, हमारा पाचन तंत्र ठप्प हो
जाएगा। हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर हो जाएगी, और हम हानिकारक रोगाणुओं से
लड़ने में असमर्थ हो जाएंगे। प्रयोगशाला में 'जर्म-फ्री' (बैक्टीरिया रहित) जानवर
पैदा किए गए हैं, लेकिन
उन्हें अत्यधिक नियंत्रित वातावरण में रखना पड़ता है। उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली
अविकसित होती है, उनकी
आंतें ठीक से विकसित नहीं होतीं, और उन्हें जीवित रहने के लिए अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है। यह स्पष्ट
रूप से दर्शाता है कि मानव और बैक्टीरिया के बीच एक सहजीवी संबंध है, जहाँ दोनों एक-दूसरे के लिए
आवश्यक हैं।
शरीर
में बैक्टीरिया का वितरण
यदि हम शरीर में बैक्टीरिया
के वितरण का एक मानचित्र बनाएँ, तो यह अत्यंत विविधतापूर्ण होगा। आंत में सबसे अधिक बैक्टीरिया होते हैं, विशेष रूप से बड़ी आंत में।
यहाँ फर्मिक्यूट्स और बैक्टेरॉयडेट्स नामक दो प्रमुख समूहों के बैक्टीरिया
प्रभुत्व रखते हैं। इनका अनुपात व्यक्ति के आहार, जीवनशैली और स्वास्थ्य
स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।
त्वचा पर बैक्टीरिया का
वितरण शरीर के विभिन्न भागों में भिन्न होता है। बगलों, पैरों के तलवों और कमर के
क्षेत्र में नमी के कारण एक प्रकार के बैक्टीरिया पनपते हैं, जबकि हाथों और चेहरे की
शुष्क त्वचा पर दूसरे प्रकार के बैक्टीरिया अधिक होते हैं। मुँह में
स्ट्रेप्टोकोकस प्रजाति के बैक्टीरिया प्रमुख होते हैं, जो दांतों पर प्लाक बनाने
के लिए जाने जाते हैं, लेकिन
स्वस्थ अवस्था में ये हानिकारक नहीं होते। नाक और फेफड़ों में भी सूक्ष्मजीवों का
एक अलग समुदाय होता है, जो
श्वसन तंत्र को संक्रमण से बचाने में मदद करता है।
क्या
यह अनुपात जीवन भर स्थिर रहता है?
यह अनुपात जीवन भर स्थिर
नहीं रहता। जन्म के समय, एक
शिशु लगभग बाँझ होता है। जैसे ही वह जन्म नहर से गुजरता है और अपनी माँ के संपर्क
में आता है, वह
बैक्टीरिया से उपनिवेशित होना शुरू हो जाता है। पहले कुछ वर्षों में, एक बच्चे का माइक्रोबायोम
बहुत तेज़ी से विकसित होता है और धीरे-धीरे एक स्थिर रूप धारण कर लेता है। वयस्कता
में यह अपेक्षाकृत स्थिर रहता है, लेकिन आहार, तनाव, बीमारी, और एंटीबायोटिक दवाओं के
सेवन से इसमें नाटकीय परिवर्तन आ सकते हैं।
बुढ़ापे में, माइक्रोबायोम में फिर से
परिवर्तन होते हैं। आहार में बदलाव, प्रतिरक्षा प्रणाली की
कमज़ोरी, और
कई दवाओं के सेवन के कारण बैक्टीरिया की विविधता कम होने लगती है। यही कारण है कि
वृद्धावस्था में पाचन संबंधी समस्याएँ और संक्रमण का खतरा अधिक होता है। इस प्रकार, हमारे शरीर में बैक्टीरिया
की संख्या और विविधता हमारे जीवनकाल के साथ-साथ एक गतिशील यात्रा है।
एंटीबायोटिक्स
का प्रभाव
एंटीबायोटिक दवाओं ने मानव
सभ्यता को हानिकारक जीवाणु संक्रमणों से बचाकर असंख्य जीवन बचाए हैं। लेकिन इनका
अंधाधुंध उपयोग एक बड़ी समस्या बन गया है। एंटीबायोटिक्स केवल हानिकारक बैक्टीरिया
को ही नहीं मारते, बल्कि
हमारे शरीर के लाभकारी बैक्टीरिया को भी नष्ट कर देते हैं। यह हमारे माइक्रोबायोम
के नाजुक संतुलन को बिगाड़ सकता है।
एंटीबायोटिक्स के एक कोर्स
के बाद, हमारी
आंत के बैक्टीरिया में भारी कमी आ सकती है। कुछ प्रजातियाँ तो पूरी तरह से समाप्त
हो सकती हैं, जिन्हें
वापस लाने में महीनों या वर्षों लग सकते हैं। यही कारण है कि आधुनिक चिकित्सा में
एंटीबायोटिक्स के साथ-साथ प्रोबायोटिक्स (लाभकारी बैक्टीरिया) और प्रीबायोटिक्स
(बैक्टीरिया के लिए भोजन) लेने की सलाह दी जाती है। हालाँकि, इस क्षेत्र में अभी भी बहुत
शोध होना बाकी है कि कैसे सर्वोत्तम रूप से माइक्रोबायोम की रक्षा की जाए।
"हम"
कौन हैं? एक दार्शनिक
दृष्टिकोण
यह प्रश्न केवल जैविक नहीं
है, बल्कि
इसका एक गहरा दार्शनिक पक्ष भी है। यदि हमारे शरीर में हमारी अपनी कोशिकाओं के
बराबर ही अन्य जीवों की कोशिकाएँ निवास करती हैं, तो "हम" की
परिभाषा क्या है? क्या
हम एक व्यक्ति हैं, या
हम एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं? आधुनिक विज्ञान इस ओर इशारा
करता है कि हम एक 'होलोबियोन्ट' हैं एक ऐसा जीव जो अपने सहजीवी
सूक्ष्मजीवों के साथ मिलकर एक इकाई के रूप में कार्य करता है।
हमारे जीनों की संख्या भी
इस धारणा को बल देती है। मानव जीनोम में लगभग 20,000-25,000 जीन होते हैं, जबकि हमारे माइक्रोबायोम के
सामूहिक जीनोम (मेटाजीनोम) में लगभग 3.3 मिलियन जीन होते हैं। यानी
आनुवंशिक दृष्टि से, हमारे
शरीर में मानव जीन की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक गैर-मानव जीन मौजूद हैं। यह
तथ्य हमें बताता है कि हमारा अस्तित्व केवल हमारे मानव डीएनए द्वारा निर्धारित
नहीं होता, बल्कि
हमारे सूक्ष्मजीवी साझेदारों द्वारा भी गहराई से प्रभावित होता है।
निष्कर्ष
तो, आइए अब हम अपने मूल प्रश्न
पर लौटते हैं क्या आपके शरीर में
बैक्टीरिया कोशिकाओं की संख्या मानव कोशिकाओं से ज्यादा है? विज्ञान का नवीनतम उत्तर है लगभग बराबर, या थोड़ी अधिक। लेकिन यह
उत्तर उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह समझना कि ये बैक्टीरिया हमारे लिए क्या
अर्थ रखते हैं। पुराना 10:1 का
मिथक भले ही टूट गया हो, लेकिन
यह सत्य कि हमारा स्वास्थ्य हमारे माइक्रोबायोम के स्वास्थ्य से अटूट रूप से जुड़ा
हुआ है, पहले
से कहीं अधिक प्रबल होकर उभरा है।
अब हम जानते हैं कि हमारी
आंत के बैक्टीरिया हमारे मूड से लेकर हमारी प्रतिरक्षा तक, हमारे वजन से लेकर हमारी
त्वचा तक सब कुछ प्रभावित करते हैं। यह ज्ञान हमें जिम्मेदारी सिखाता है हमें अपने आहार का ध्यान
रखना है, अनावश्यक
एंटीबायोटिक्स के सेवन से बचना है, और फाइबर युक्त भोजन (जो
हमारे अच्छे बैक्टीरिया का भोजन है) का सेवन करना है। हमारा शरीर एक अद्भुत
पारिस्थितिकी तंत्र है, और
इस पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखना ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
अतः अगली बार जब आप अपने आप
को दर्पण में देखें, तो
याद रखें कि आप अकेले नहीं हैं। आप अपने साथ खरबों छोटे-छोटे साथियों को लेकर चल
रहे हैं, जो
चुपचाप आपके लिए काम कर रहे हैं। उनकी संख्या चाहे कितनी भी हो, उनका योगदान अमूल्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले
प्रश्न
प्रश्न 1- क्या यह सच है कि शरीर में
बैक्टीरिया की संख्या मानव कोशिकाओं से 10 गुना अधिक है?
उत्तर- नहीं, यह एक पुराना मिथक है। 2016 में हुए नवीनतम शोध के
अनुसार, एक
औसत वयस्क में बैक्टीरिया और मानव कोशिकाओं का अनुपात लगभग 1.3:1 है, अर्थात बैक्टीरिया की
संख्या मानव कोशिकाओं से केवल थोड़ी अधिक है, 10 गुना नहीं।
प्रश्न 2- यदि बैक्टीरिया की संख्या
इतनी अधिक है, तो
उनका वजन कितना होता है?
उत्तर- हालाँकि बैक्टीरिया की संख्या
अधिक होती है, लेकिन
वे अत्यंत छोटे होते हैं। एक औसत वयस्क में सभी बैक्टीरिया का कुल वजन लगभग 0.2 से 0.5 किलोग्राम (200-500 ग्राम) के बीच होता है, जो शरीर के कुल वजन का लगभग
1% से
भी कम होता है।
प्रश्न 3- क्या शरीर के सभी
बैक्टीरिया हानिकारक होते हैं?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। हमारे शरीर
में अधिकांश बैक्टीरिया लाभकारी या तटस्थ होते हैं। ये पाचन में सहायता, विटामिन का संश्लेषण, और हानिकारक रोगाणुओं से
सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। हानिकारक बैक्टीरिया केवल तभी समस्या
पैदा करते हैं जब प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो या उनकी अत्यधिक वृद्धि हो जाए।
प्रश्न 4- एंटीबायोटिक्स लेने से मेरे
शरीर के अच्छे बैक्टीरिया पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर- एंटीबायोटिक्स हानिकारक और
लाभकारी दोनों प्रकार के बैक्टीरिया को मार सकते हैं। इससे माइक्रोबायोम में
असंतुलन हो सकता है, जिससे
पाचन संबंधी समस्याएँ, डायरिया, या यीस्ट इंफेक्शन हो सकते
हैं। इसलिए, डॉक्टर
की सलाह के बिना एंटीबायोटिक्स न लें, और यदि लें तो
प्रोबायोटिक्स या प्रीबायोटिक्स का सेवन करने पर विचार करें।
प्रश्न 5- मैं अपने माइक्रोबायोम
(अच्छे बैक्टीरिया) को स्वस्थ कैसे रख सकता हूँ?
उत्तर: अपने माइक्रोबायोम को
स्वस्थ रखने के लिए-
1. फाइबर युक्त भोजन (सब्जियाँ, फल, साबुत अनाज) अधिक खाएँ।
2. फर्मेंटेड फूड्स (दही, छाछ, किमची, इडली, डोसा) का सेवन करें।
3. अनावश्यक एंटीबायोटिक्स के
सेवन से बचें।
4. तनाव को नियंत्रित रखें और पर्याप्त
नींद लें।
5. प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक
शर्करा से बचें।
प्रश्न 6- क्या नवजात शिशु के शरीर
में बैक्टीरिया होते हैं?
उत्तर: गर्भाशय में शिशु लगभग बाँझ
होता है। जन्म के समय, जब
वह जन्म नहर से गुजरता है और माँ तथा पर्यावरण के संपर्क में आता है, तो वह बैक्टीरिया से
उपनिवेशित होना शुरू होता है। यह प्रक्रिया शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली के विकास
के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 7- क्या आंत के बैक्टीरिया
मेरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, आधुनिक शोध 'गट-ब्रेन एक्सिस' नामक एक संबंध को दर्शाते
हैं। आंत के बैक्टीरिया न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे सेरोटोनिन) के उत्पादन को प्रभावित
करते हैं, जो
मूड, चिंता
और अवसाद को प्रभावित कर सकते हैं। यह क्षेत्र अभी भी सक्रिय शोध के अधीन है।




