7156863209947891,DIRECT,fec0942fa0 हमारी त्वचा भावनात्मक दर्द को कैसे याद रखती है?

हमारी त्वचा भावनात्मक दर्द को कैसे याद रखती है?



हमारी त्वचा भावनात्मक दर्द को कैसे याद रखती है?




हमारी- त्वचा -भावनात्मक -दर्द -को -कैसे- याद -रखती- है?



हमारी त्वचा केवल बाहरी परत नहीं है, बल्कि यह भावनाओं और अनुभवों की संवेदनशील स्मृति भी बन सकती है। जब हम तनाव, डर या दुख जैसी भावनात्मक स्थितियों से गुजरते हैं, तो शरीर हार्मोन और तंत्रिका संकेतों के माध्यम से प्रतिक्रिया देता है। ये प्रतिक्रियाएँ त्वचा पर असर डालती हैं जैसे खुजली, लालिमा, पसीना या रोंगटे खड़े होना। समय के साथ मस्तिष्क और त्वचा के बीच बना यह संबंध भावनात्मक अनुभवों को “याद” रखने जैसा प्रभाव पैदा करता है। इसलिए कुछ स्थितियों में पुरानी यादें फिर सक्रिय होकर त्वचा में प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकती हैं। यह दिखाता है कि शरीर और भावनाएँ गहराई से जुड़े हैं।

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी त्वचा केवल शरीर का सबसे बड़ा अंग है  एक जैविक आवरण जो हमें गर्मी, ठंड, चोट और संक्रमण से बचाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी त्वचा भावनात्मक दर्द को भी कैसे महसूस कर सकती है  इतना कि वह उस दर्द को याद भी रखती है?

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि त्वचा सिर्फ बाहरी संवेदना का अंग नहीं है  यह हमारी भावनाओं, अनुभवों और यहाँ तक कि मानसिक यादों से भी गहराई से जुड़ी होती है।

आज के इस ब्लॉग पोस्ट में हम विस्तार से यह समझेंगे कि-

  1.  त्वचा और तंत्रिका तंत्र का भावनात्मक दर्द से क्या संबंध है
  2.  त्वचा दर्द को कैसे यादरखती है
  3.  क्यों पुराने अनुभव त्वचा पर असर छोड़ते हैं
  4.  यह विज्ञान, मनोविज्ञान और व्यवहार के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण है
  5.  इसे दैनिक जीवन में हम कैसे पहचान सकते हैं

त्वचा और तंत्रिका तंत्र



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त्वचा और तंत्रिका तंत्र का संबंध बहुत गहरा और सीधा होता है। त्वचा में लाखों संवेदी रिसेप्टर होते हैं, जो स्पर्श, तापमान, दर्द और दबाव जैसी संवेदनाओं को महसूस करते हैं। ये संकेत नसों के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जहाँ उनका विश्लेषण होता है और शरीर उचित प्रतिक्रिया देता है। इसी कारण हल्का स्पर्श भी सुकून दे सकता है, जबकि अचानक गर्म चीज़ छूने पर तुरंत हाथ पीछे हट जाता है। भावनात्मक स्थितियाँ जैसे तनाव या डर भी तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करती हैं, जिससे त्वचा पर पसीना, रोंगटे या लालिमा दिख सकती है। यह संबंध शरीर की सुरक्षा और भावनात्मक अभिव्यक्ति दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हम जानते हैं कि दर्द का अनुभव एक न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका विज्ञान) प्रक्रिया है।

तथ्य-

 त्वचा में सैकड़ों मिलियन नर्व एंडिंग्स होती हैं। ये नर्व एंडिंग्स केवल तापमान और स्पर्श नहीं पहचानती  वे संभावित खतरे को भी ट्रिगर करती हैं।
जब कोई नकारात्मक अनुभव होता है, तो नर्व एंडिंग्स से मस्तिष्क तक संकेत भेजा जाता है यही दर्द महसूस होता है।

भावनात्मक दर्द त्वचा पर कैसे प्रकट होता है?



हमारी -त्वचा- भावनात्मक -दर्द -को -कैसे -याद -रखती -है?


भावनात्मक दर्द केवल मन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अक्सर त्वचा पर भी दिखाई देने लगता है। जब व्यक्ति तनाव, चिंता या दुख महसूस करता है, तो शरीर में कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन बढ़ जाते हैं। इससे त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ जाती है और कई प्रतिक्रियाएँ दिखाई दे सकती हैं।

  • तनाव के समय त्वचा पर लालिमा या चकत्ते उभर सकते हैं  
  • चिंता होने पर खुजली या जलन महसूस हो सकती है 
  • घबराहट में अत्यधिक पसीना आना आम है 
  • लंबे समय तक भावनात्मक दबाव से मुंहासे या एलर्जी बढ़ सकती है 
  • डर या दुख में रोंगटे खड़े होना भी त्वचा की प्रतिक्रिया है 

ये संकेत बताते हैं कि मस्तिष्क, हार्मोन और त्वचा आपस में जुड़े हैं। भावनात्मक अनुभव शरीर को प्रभावित करते हैं और त्वचा उन बदलावों को बाहरी रूप में व्यक्त कर देती है। जब हमारा दिमाग तनाव, अपमान या दर्दनाक घटना का सामना करता है, तो शरीर में एक मात्रात्मक बदलाव शुरू हो जाता है-

मस्तिष्क में परिवर्तन

  •  एमिग्डाला (भावनाओं का केंद्र) सक्रिय
  •  कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ता
  •  न्यूरोट्रांसमीटर असंतुलन

इन परिवर्तनों का सीधा असर त्वचा पर भी पड़ता है-

त्वचा में बदलाव

 लालिमा या सूजन

  •  खुजली या जलन की अनुभूति
  •  त्वचा का संवेदनशील होना
  • चकत्ते, फफोले और सूखेपन की प्रतिक्रिया

यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि तनाव और मानसिक दर्द की स्थिति में त्वचा पर रोग प्रतिक्रियाएँ बढ़ जाती हैं। लेकिन भावनात्मक दर्द  जैसे अपमान, डर, अवहेलना या आघात  को महसूस करना भी तंत्रिका तंत्र की ही उपलब्धि है। मानसशास्त्र और न्यूरोसाइंस के अध्ययन बताते हैं कि भावनात्मक दर्द का अनुभव भी मस्तिष्क में तंत्रिका मार्ग सक्रिय करता है जो शारीरिक दर्द में सक्रिय होते हैं।


स्मृति और त्वचा का संबंध


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स्मृति और त्वचा का संबंध इस बात को दर्शाता है कि शरीर पुराने अनुभवों को केवल दिमाग में ही नहीं, बल्कि शारीरिक स्तर पर भी संजो कर रखता है। जब कोई व्यक्ति दर्दनाक या तनावपूर्ण घटना से गुजरता है, तो मस्तिष्क उस अनुभव को भावनात्मक स्मृति के रूप में संग्रहित कर लेता है। बाद में समान परिस्थितियों या यादों के सक्रिय होने पर तंत्रिका तंत्र फिर से प्रतिक्रिया देता है, जिससे त्वचा पर खुजली, पसीना, या झनझनाहट महसूस हो सकती है। इसे “दर्द की याद” कहा जा सकता है, जहाँ शरीर बिना वास्तविक खतरे के भी प्रतिक्रिया देता है। यह दर्शाता है कि भावनात्मक अनुभव लंबे समय तक त्वचा और शरीर की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

अब आते हैं सबसे दिलचस्प हिस्से पर-


क्या त्वचा वास्तव में भावनात्मक दर्द को याद रखती है?



                          हमारी -त्वचा- भावनात्मक -दर्द -को -कैसे- याद- रखती -है?


त्वचा वास्तव में भावनात्मक दर्द को यादनहीं रखती, लेकिन ऐसा महसूस हो सकता है क्योंकि त्वचा, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र आपस में गहराई से जुड़े होते हैं। जब कोई दुखद या तनावपूर्ण अनुभव होता है, तो मस्तिष्क उसे भावनात्मक स्मृति के रूप में संग्रहीत कर लेता है। बाद में वही याद सक्रिय होने पर शरीर फिर से प्रतिक्रिया देता हैजैसे खुजली, लालिमा, पसीना या झनझनाहट।

इसे इस तरह समझें स्मृति मस्तिष्क में होती है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया त्वचा पर दिखाई देती है। इसलिए लगता है कि त्वचा दर्द को याद रखती है। वास्तव में यह मस्तिष्क-त्वचा संचार का परिणाम है, जो पुराने अनुभवों के आधार पर शरीर को सतर्क करता है।

 आंशिक रूप से लेकिन कैसेयह समझने के लिए हमें स्मृतियोंके प्रकार को समझना होगा-

दो तरह की स्मृतियाँ-

 संज्ञात्मक स्मृति - शब्दों और तथ्यों के रूप में
 सांस्मृतिक/शारीरिक स्मृति- शरीर अनुभव के रूप में

जब हम किसी दर्दनाक घटना का अनुभव करते हैं, तो हमारा शरीर दो तरीकों से याद रखता है-

 1. मस्तिष्क में निशान बनना

दर्द और भय की स्मृति न्यूरल नेटवर्क में पैटर्न के रूप में सहेज जाती है।

2. त्वचा में प्रतिक्रिया का निशान

जिन हिस्सों पर दर्द का अनुभव हुआ, वे संवेदनशीलता और भावनात्मक ट्रिगर्स के प्रति अधिक प्रतिक्रियाशील हो जाते हैं।

उदाहरण-
  •  बचपन में तनिक चोट लगी भाग पर वयस्क जीवन में तनाव में जलन होना
  •  पुरानी चोट वाली त्वचा पर अवसाद या चिंता की अवस्था में खुजली

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि त्वचा की नर्व एंडिंग्स आधे-अधूरे व्यवहारात्मक और न्यूरोलॉजिकल कनेक्शनों के साथ अस्तित्व में रहती हैं। यह एक प्रकार की सांस्मृतिक स्मृति है, जो भावनात्मक अनुभव को त्वचा में भी संग्रहीत करती है।


भावनात्मक दर्द और त्वचा का जुड़ाव


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भावनात्मक दर्द और त्वचा का जुड़ाव मस्तिष्क, हार्मोन और तंत्रिका तंत्र के आपसी संबंध से समझा जा सकता है। जब व्यक्ति तनाव, चिंता या दुख महसूस करता है, तो शरीर में तनाव हार्मोन बढ़ जाते हैं, जो त्वचा की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। इसके कारण त्वचा पर खुजली, लालिमा, पसीना या दाने दिखाई दे सकते हैं। लंबे समय तक भावनात्मक दबाव रहने पर मुंहासे, एलर्जी या त्वचा का सूखापन भी बढ़ सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि त्वचा और मस्तिष्क एक ही तंत्रिका नेटवर्क से जुड़े हैं। इसलिए भावनात्मक अनुभव अक्सर त्वचा के माध्यम से बाहरी संकेत के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

न्यूरोट्रांसमीटर और त्वचा

जब हम भावनात्मक दर्द का अनुभव करते हैं-

  •  कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) बढ़ता है
  •  एड्रेनालीन फैलती है
  •  न्यूरोट्रांसमीटर असंतुलन होता है

ये सभी तत्व न केवल दिमाग प्रभावित करते हैं  बल्कि त्वचा की संवेदनशीलता को भी बदल देते हैं।

 न्यूरोलॉजिकल रिसर्च कहते हैं-

  • भावनात्मक और शारीरिक दर्द के संकेत मस्तिष्क में समान न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करते हैं।
  •  दर्द के अनुभव स्मृति पैटर्नबनाते हैं जो भविष्य में त्वचा की प्रतिक्रियाओं को तेज कर देते हैं।
  • यही कारण है कि कुछ लोगों को पुरानी यादों के प्रभाव में त्वचा पर शारीरिक प्रतिक्रिया होती है।

क्या पुरानी चोटें, पुरानी भावनाएँ त्वचा में रहते हैं?

पुरानी शारीरिक चोटें और पुरानी भावनाएँ सीधे-सीधे त्वचा में “रहती” नहीं हैं, लेकिन उनका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई दे सकता है। जब कोई चोट लगती है, तो त्वचा पर निशान बन सकता है, जो शरीर की उपचार प्रक्रिया की याद दिलाता है। इसी तरह भावनात्मक अनुभव मस्तिष्क में स्मृति के रूप में संग्रहित होते हैं, और जब वही यादें या परिस्थितियाँ दोबारा सामने आती हैं, तो तंत्रिका तंत्र सक्रिय होकर त्वचा में प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।
कई बार पुराने तनाव से बार-बार खुजली, पसीना या लालिमा महसूस होती है, भले ही वर्तमान में कोई नया खतरा न हो। यह “भावनात्मक स्मृति” का प्रभाव होता है। इसलिए कहा जाता है कि शरीर, खासकर त्वचा, पुराने अनुभवों की प्रतिक्रिया को दोहरा सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि भावनाएँ त्वचा में जमा रहती हैं, बल्कि मस्तिष्क-त्वचा का संबंध उन अनुभवों को फिर से सक्रिय कर देता है।

ध्यान देने योग्य तथ्य-

  •  यदि आपने कभी त्वचा को चोट पहुँचाई है  वहाँ की नर्व एंडिंग्स कुछ बदल जाती हैं।
  • यदि उस समय आपकी मानसिक स्थिति तनावपूर्ण थी,  तो मस्तिष्क दर्द के अनुभव को गहरा लेबल कर देता है।

अब यदि आपका मूड खराब है,कोई पुराना ट्रिगर सक्रिय है,आप चिंतित/डरे हुए हैं तो आपके शरीर की प्रतिक्रिया त्वचा में अधिक तीव्र हो सकती है। यह सिर्फ याद नहीं  यह एक श्रृंखला प्रतिक्रिया है


जब भावनात्मक दर्द याद आता है तो त्वचा क्यों प्रतिक्रिया देती है?

जब भावनात्मक दर्द याद आता है, तो मस्तिष्क उस पुराने अनुभव को फिर से सक्रिय कर देता है। मस्तिष्क और त्वचा के बीच सीधा संबंध तंत्रिका तंत्र और हार्मोन के माध्यम से होता है। जैसे ही पुरानी यादें उभरती हैं, शरीर इसे वास्तविक स्थिति मानकर प्रतिक्रिया देता है। इससे तनाव हार्मोन बढ़ते हैं और त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

  • याद आते ही खुजली या झनझनाहट महसूस हो सकती है 
  • पसीना आना या त्वचा का ठंडा पड़ना संभव है 
  • कुछ लोगों में लालिमा या छोटे दाने भी उभर सकते हैं 
  • घबराहट में रोंगटे खड़े होना भी आम प्रतिक्रिया है 

यह प्रतिक्रिया इसलिए होती है क्योंकि मस्तिष्क भावनात्मक दर्द को शरीर के लिए चेतावनी मानता है। त्वचा इस चेतावनी को बाहरी संकेत के रूप में दिखाती है। इस तरह भावनात्मक स्मृति और शारीरिक प्रतिक्रिया एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।

यह दो कारणों से होता है-

न्यूरोलॉजिकल कनेक्शन

मस्तिष्क और त्वचा के बीच दो-तरफ़ा संचारलगातार चलता रहता है।

  •  दिमाग से त्वचा तक रिसेप्टर्स
  •  त्वचा से दिमाग तक सिग्नल
 भावनात्मक तनाव - त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ती है
 त्वचा भावना को न्यूरल नेटवर्क तक भेजती है, यह वैज्ञानिक रूप से मस्तिष्क-त्वचा अक्ष(Brain-Skin Axis) के नाम से जाना जाता है।

पुराना दर्द और नई प्रतिक्रियाएँ

पुराना दर्द अक्सर समय के साथ खत्म हो जाता है, लेकिन उसकी स्मृति शरीर में नई प्रतिक्रियाएँ पैदा कर सकती है। जब कोई व्यक्ति पहले अनुभव किए गए तनाव या भावनात्मक चोट जैसी स्थिति का सामना करता है, तो मस्तिष्क तुरंत सतर्क हो जाता है। यह सतर्कता तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करती है, जिससे त्वचा में खुजली, पसीना, लालिमा या झनझनाहट महसूस हो सकती है। भले ही वर्तमान में वास्तविक खतरा न हो, शरीर पुरानी याद को चेतावनी मानकर प्रतिक्रिया देता है। इसलिए कहा जाता है कि पुराना दर्द नई प्रतिक्रियाओं का कारण बन सकता है। यह प्रक्रिया दिखाती है कि स्मृति, भावनाएँ और शरीर आपस में गहराई से जुड़े हैं।

  1.  पुराना दर्द फिजिकल न हो तो भी त्वचा पर असर कर सकता है
  2.  भावनात्मक ट्रिगर पुरानी यादों को सक्रिय करता है
  3.  त्वचा पर तनाव प्रतिक्रियाएं शारीरिक रूप में दिखने लगती हैं
  4.  कई लोगों को खुजली, लालिमा, सूजन या असहजता का अनुभव होता है

यह व्यवहारिक रूप से देखा भी गया है-

लोग जिनके मन में पुरानी भावनात्मक यादें हैं  वे तनाव में अक्सर त्वचा से जुड़ी समस्याएँ महसूस करते हैं।


कैसे समझें कि आपकी त्वचा भावनात्मक दर्द को दर्शा रही है?

यह समझना आसान नहीं होता कि त्वचा की समस्या शारीरिक कारण से है या भावनात्मक दर्द से जुड़ी है। फिर भी कुछ संकेत बताते हैं कि आपकी त्वचा भावनाओं को दर्शा रही हो सकती है-

  • तनाव या चिंता के समय अचानक खुजली या जलन बढ़ना 
  • किसी खास याद या परिस्थिति में त्वचा पर लालिमा आना 
  • बिना स्पष्ट एलर्जी के बार-बार दाने निकलना 
  • घबराहट में हथेलियों या चेहरे पर पसीना आना 
  • भावनात्मक दबाव के दौरान मुंहासों का बढ़ जाना 
  • आराम या खुश रहने पर त्वचा का सामान्य हो जाना 

यदि त्वचा की प्रतिक्रिया भावनाओं के बदलने के साथ बदलती है, तो यह संकेत हो सकता है कि उसका संबंध भावनात्मक दर्द से है। ऐसे में तनाव कम करना, पर्याप्त नींद लेना और मन को शांत रखने की आदतें त्वचा को भी संतुलित रखने में मदद कर सकती हैं।

यदि यह बार-बार होता है, तो केवल शारीरिक कारण नहीं बल्कि भावनात्मक ट्रिगर भी जिम्मेदार हो सकता है।


वास्तविक जीवन के उदाहरण

वास्तविक जीवन में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ भावनात्मक दर्द त्वचा के माध्यम से प्रकट होता है:

  • परीक्षा या इंटरव्यू से पहले कुछ लोगों की हथेलियों में अत्यधिक पसीना आने लगता है
  • किसी दर्दनाक याद को सोचते ही गर्दन या चेहरे पर लालिमा उभर आती है
  • लंबे समय तक तनाव में रहने वाले लोगों में मुंहासे अचानक बढ़ जाते हैं
  • डर या घबराहट की स्थिति में रोंगटे खड़े होना आम अनुभव है
  • पारिवारिक विवाद या भावनात्मक दबाव के दौरान त्वचा में खुजली महसूस होना
  • कुछ लोगों को चिंता होने पर एलर्जी जैसे दाने निकल आते हैं
  • दुख या शोक की स्थिति में त्वचा का रूखा और बेजान दिखना

ये उदाहरण दिखाते हैं कि भावनाएँ केवल मानसिक नहीं रहतीं, बल्कि त्वचा के जरिए शारीरिक रूप में भी सामने आ सकती हैं।

उदाहरण 1 बचपन की चोट

बचपन में चोट लगने पर भावनात्मक तनाव के साथ त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

उदाहरण 2सामाजिक अपमान

किसी ने सार्वजनिक रूप से अपमान किया,  भावनात्मक दर्द त्वचा संवेदनशीलता के रूप में वापस आता है।


निष्कर्ष 

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि त्वचा स्वयं भावनात्मक दर्द को यादरखती है, लेकिन त्वचा, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के बीच गहरा संबंध ऐसा अनुभव पैदा करता है मानो त्वचा में स्मृति मौजूद हो। जब व्यक्ति किसी तनावपूर्ण या दुखद अनुभव से गुजरता है, तो मस्तिष्क उस घटना को भावनात्मक स्मृति के रूप में संजो लेता है। बाद में जब वही परिस्थिति या उससे जुड़ी याद सक्रिय होती है, तो तंत्रिका तंत्र शरीर को सतर्क कर देता है। इस प्रक्रिया में त्वचा खुजली, लालिमा, पसीना या झनझनाहट जैसी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से संकेत दे सकती है।

यह प्रतिक्रिया शरीर की सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा भी है, जो पुराने अनुभवों से सीखकर भविष्य में संभावित खतरे से बचने की कोशिश करती है। हालांकि हर त्वचा समस्या भावनात्मक कारण से नहीं होती, लेकिन बार-बार भावनाओं के साथ बदलती त्वचा प्रतिक्रियाएँ इस संबंध को दर्शाती हैं। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य, तनाव नियंत्रण और सकारात्मक जीवनशैली त्वचा के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंततः, त्वचा और भावनाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं, और शरीर अपने अनुभवों को अलग-अलग तरीकों से व्यक्त करता है।

त्वचा खुद याद नहीं रखती परंतु शरीर की न्यूरोलॉजिकल प्रणाली दर्द के अनुभवको याद रखती है, जो बाद में त्वचा पर अभिव्यक्त होता है।

यह केवल शारीरिक या केवल मानसिक नहीं है  यह दोनों का संयोजन है। हमारी त्वचा हमें सिर्फ संवेदनाएँ नहीं देती यह हमें हमारी भावनात्मक यात्रा का भी आईना दिखाती है।

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